इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश Justice Yashwant Varma ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया है। उनके खिलाफ मार्च 2025 में दिल्ली स्थित सरकारी आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में अधजली नकदी मिलने के मामले के बाद महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष Om Birla ने 146 सांसदों के समर्थन से प्रस्ताव स्वीकार करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की, जो फिलहाल मामले की जांच कर रही है।
जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम तब विवादों में आया जब उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर छापेमारी के दौरान जला हुआ कैश बरामद हुआ था। इस घटना के बाद कानूनी और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया था।
इस गंभीर विवाद के चलते उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से वापस उनके मूल कैडर इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया था।
महाभियोग की प्रक्रिया और जांच समिति
- जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर पिछले साल संसद में भी हलचल तेज हुई थी।
- अगस्त 2024: 12 अगस्त को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए एक बहुदलीय नोटिस स्वीकार किया गया था।
- समिति का गठन: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया।
- रिपोर्ट की प्रतीक्षा: यह समिति अपनी जांच रिपोर्ट आगामी मानसून सत्र में संसद को सौंप सकती है।
हालिया घटनाक्रम और कार्यकाल
जस्टिस यशवंत वर्मा ने 5 अप्रैल, 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली थी, लेकिन वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। फिलहाल उनके खिलाफ एक आंतरिक जांच भी जारी है। जानकारों का मानना है कि महाभियोग की जटिल प्रक्रिया और जांच के बढ़ते दबाव के चलते उन्होंने इस्तीफा देना ही उचित समझा।
जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा इस बात का संकेत है कि ‘कैश कांड’ की आंच काफी गहरी थी। अब सबकी नजरें मानसून सत्र पर टिकी हैं, जब ओम बिरला द्वारा गठित समिति अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। यदि रिपोर्ट में आरोप सिद्ध होते हैं, तो सेवानिवृत्ति के बाद भी उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता साफ हो सकता है।
