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जलियांवाला बाग की 107वीं बरसी: वो कुआं आज भी गवाही देता है, वो दीवारें आज भी सिसकती हैं

अमृतसर। आज से ठीक 107 साल पहले, बैसाखी की वह सुनहरी सुबह अमृतसर के लिए खुशियां लेकर आई थी, लेकिन शाम होते-होते जलियांवाला बाग की मिट्टी इंसानी खून से लाल हो चुकी थी। 13 अप्रैल 1919 का वह दिन सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास का वह गहरा जख्म है जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के ‘सभ्य’ होने के मुखौटे को पूरी दुनिया के सामने उतार दिया था।

उम्मीदों का कत्ल और रॉलेट एक्ट का दंश

प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) में 13 लाख भारतीय सैनिकों ने ब्रिटेन के लिए अपनी जान की बाजी लगाई थी। देश को उम्मीद थी कि इस वफादारी के बदले ‘आजादी’ या ‘नरमी’ मिलेगी, लेकिन बदले में मिला—रॉलेट एक्ट। एक ऐसा काला कानून जिसने बिना दलील, बिना वकील और बिना अपील के भारतीयों को सलाखों के पीछे डालने की शक्ति गोरों को दे दी।

बैसाखी का वो ‘खूनी’ सन्नाटा

जब पंजाब के लोकप्रिय नेता डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल को गिरफ्तार किया गया, तो जनता का गुस्सा फूट पड़ा। 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में करीब 20 हजार लोग शांतिपूर्ण विरोध के लिए जुटे थे। सभा में बुजुर्ग, महिलाएं और नन्हे बच्चे भी थे, जो बैसाखी के मेले के बाद वहां सुस्ताने रुके थे।

तभी जनरल डायर अपनी सेना के साथ वहां पहुंचा। उसने बाहर निकलने के एकमात्र संकरे रास्ते को बंद किया और बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर 1650 राउंड गोलियां दाग दीं। 10 मिनट तक मौत का तांडव चला। गोलियां तब थमीं, जब सैनिकों के पास बारूद खत्म हो गया।

शहादत का प्रतीक: ‘खूनी कुआं’

उस दिन जलियांवाला बाग के बीच स्थित वह कुआं लाशों से पट गया था। अपनी जान बचाने के लिए लोग कुएं में कूदते रहे, लेकिन डायर की बर्बरता ने उन्हें वहां भी नहीं बख्शा। आज भी वहां की दीवारों पर मौजूद गोलियों के निशान उस खौफनाक मंजर की गवाही देते हैं। सरकारी आंकड़ों ने संख्या को छुपाया, लेकिन हकीकत में 1500 से ज्यादा जिंदगियां उस दिन राख हो गई थीं।

माफी का इंतजार और जागता हुआ भारत

इस नरसंहार ने भारत की सोई हुई आत्मा को झकझोर दिया। इसी के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की नींव रखी, जिसने अंततः ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दीं।

आज 107 साल बाद भी, ब्रिटेन ने इस घृणित कृत्य के लिए औपचारिक माफी नहीं मांगी है। लेकिन जलियांवाला बाग की मिट्टी आज भी हर भारतीय को याद दिलाती है कि हमारी आजादी कितनी महंगी है।

news desk

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