- इजराइल की संसद नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीटों की जरूरत है
- लेकिन एग्जिट पोल में बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर नजर आ रहा है
- ऐसे में यूसुफ जबरीन और मंसूर अब्बास की भूमिका अहम हो सकती है
- हालांकि, सरकार का अंतिम गणित चुनाव परिणामों और गठबंधन की बातचीत से तय होगा
इजराइल की राजनीति में चुनावी मुकाबला केवल दो बड़े गठबंधनों के बीच सिमटता नजर नहीं आ रहा, बल्कि सरकार बनाने के लिए छोटे दलों का समर्थन भी निर्णायक साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गठबंधन अगर बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंचता है, तो सत्ता में उनकी वापसी का रास्ता मुश्किल हो सकता है। ऐसे राजनीतिक समीकरण में अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं और पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। सामने आए एग्जिट पोल के आंकड़ों में नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से पीछे दिखाई दे रहा है। ऐसे में यूसुफ जबरीन और मंसूर अब्बास जैसे नेताओं के रुख पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें टिक सकती हैं।
हालांकि, एग्जिट पोल के आंकड़े अंतिम नतीजे नहीं होते। सरकार किसकी बनेगी, यह वास्तविक चुनाव परिणामों और गठबंधन बनाने की कोशिशों पर निर्भर करेगा।
Israel Election: बहुमत के आंकड़े से कितनी दूर नेतन्याहू?
टाइम्स ऑफ इजराइल के हवाले से दी गई जानकारी के मुताबिक, एग्जिट पोल में नेतन्याहू के गठबंधन को लगभग 55 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। वहीं, उनके विरोधी गठबंधन को 49 सीटें मिलने की संभावना बताई गई है। अरब समर्थित दो राजनीतिक समूहों के खाते में कुल 16 सीटें जाने का अनुमान है।
यदि ये आंकड़े वास्तविक नतीजों में बदलते हैं, तो किसी भी प्रमुख गठबंधन के लिए अपने दम पर सरकार बनाना आसान नहीं होगा।
नेतन्याहू के गठबंधन को बहुमत के लिए छह और सीटों की जरूरत होगी। दूसरी ओर, विपक्षी खेमे को भी सरकार बनाने के लिए अतिरिक्त सहयोगियों का समर्थन जुटाना पड़ेगा।
यही वजह है कि चुनाव के बाद होने वाली गठबंधन की बातचीत महत्वपूर्ण हो सकती है। इजराइल की संसदीय व्यवस्था में छोटे दलों का समर्थन कई बार सरकार गठन की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाता है।
कौन हैं यूसुफ जबरीन, जिनकी भूमिका हो सकती है अहम?
यूसुफ जबरीन का नाम इजराइल के चुनावी समीकरणों में चर्चा का विषय बना हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह 2016 में पहली बार नेसेट के सदस्य बने थे और 2021 तक संसद में रहे।
अरब राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विभिन्न अरब दलों के बीच सहयोग की राजनीति के संदर्भ में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यदि चुनाव परिणामों में किसी भी प्रमुख गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो जबरीन से जुड़े राजनीतिक समूहों का समर्थन सरकार बनाने की कोशिशों को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि उनका समर्थन किसी एक नेता को प्रधानमंत्री बना देगा। वास्तविक स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित दलों को कितनी सीटें मिलती हैं और वे किन शर्तों पर किसी गठबंधन को समर्थन देने के लिए तैयार होते हैं।
मंसूर अब्बास की पार्टी का समर्थन क्यों है महत्वपूर्ण?
मंसूर अब्बास इजराइल की राजनीति में अरब नागरिकों के प्रतिनिधित्व के लिए पहचाने जाने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। वह यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राम (Ra’am) पार्टी का नेतृत्व करते हैं।
उनकी राजनीतिक पहचान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी पार्टी अतीत में इजराइल की गठबंधन राजनीति का हिस्सा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अरब प्रतिनिधित्व वाली पार्टियां देश की संसदीय राजनीति में केवल विपक्ष की भूमिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कुछ परिस्थितियों में सरकार गठन को भी प्रभावित कर सकती हैं।
अगर किसी गठबंधन को बहुमत के लिए अतिरिक्त सांसदों की जरूरत पड़ती है, तो मंसूर अब्बास की पार्टी का रुख अहम हो सकता है। लेकिन उनका समर्थन किसे मिलेगा और किन शर्तों पर मिलेगा, यह राजनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगा।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: यूसुफ जबरीन और मंसूर अब्बास को मुस्लिम नेताओं के रूप में पेश करने के बजाय इजराइल की अरब राजनीतिक पार्टियों और उनके संसदीय प्रतिनिधित्व के संदर्भ में समझना अधिक सटीक होगा। दोनों की राजनीतिक भूमिका और दलगत स्थिति अलग-अलग है।
क्या डोनाल्ड ट्रंप नेतन्याहू और विपक्ष को साथ ला पाएंगे?
इजराइल की राजनीति में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका भी चर्चा में है। रिपोर्टों के मुताबिक, वाशिंगटन में नेतन्याहू और उनके विरोधी खेमे के नेता गादी आइजनकोट के बीच संभावित सहयोग की कोशिशों को लेकर चर्चा हुई है।
ऐसे किसी गठबंधन का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर साझा रणनीति तैयार करना हो सकता है। हालांकि, किसी संभावित गठबंधन को लेकर बातचीत और उसके वास्तव में बन जाने के बीच बड़ा अंतर है।
नेतन्याहू और विपक्षी नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद, सरकार की नीतियां और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे किसी भी समझौते की राह में चुनौती बन सकते हैं।
ट्रंप का समर्थन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इजराइल में सरकार गठन का अंतिम फैसला नेसेट की सीटों और सांसदों के समर्थन से ही होगा।
ईरान से तनाव के बीच इजराइल में सरकार गठन क्यों अहम?
इजराइल की घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा के बीच गहरा संबंध है। ईरान के साथ तनाव, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और सैन्य रणनीति जैसे मुद्दे नई सरकार के सामने प्रमुख चुनौतियां रह सकते हैं।
यदि चुनाव के बाद किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो सरकार गठन में देरी हो सकती है। ऐसी स्थिति में गठबंधन के सहयोगियों के बीच नीतिगत समझौते भी महत्वपूर्ण होंगे।
नेतन्याहू के लिए चुनौती केवल प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की नहीं, बल्कि संसद में स्थिर समर्थन जुटाने की भी होगी। वहीं, विपक्षी गठबंधन को भी यह साबित करना होगा कि उसके पास वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए पर्याप्त राजनीतिक समर्थन मौजूद है।
क्या नेतन्याहू की वापसी मुश्किल है?
एग्जिट पोल के आंकड़ों के आधार पर नेतन्याहू की सत्ता में वापसी को मुश्किल जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसे असंभव कहना सही नहीं होगा।
यदि उनका गठबंधन अन्य दलों का समर्थन जुटा लेता है, तो सरकार बनाने का रास्ता खुल सकता है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों के बीच सहमति बनती है और उन्हें आवश्यक समर्थन मिलता है, तो नेतन्याहू के सामने सत्ता से बाहर होने की चुनौती खड़ी हो सकती है।
इजराइल चुनाव का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू बहुमत जुटाकर सत्ता में वापसी करेंगे या विपक्षी दल नया गठबंधन बनाने में सफल होंगे। यूसुफ जबरीन और मंसूर अब्बास से जुड़े राजनीतिक समीकरण इस बहस को महत्वपूर्ण बना सकते हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर आधिकारिक चुनाव परिणाम और गठबंधन की बातचीत के बाद ही स्पष्ट होगी।