नई दिल्ली: स्मार्टफोन अब सिर्फ युवाओं और बच्चों तक सीमित नहीं रह गया है। बड़ी संख्या में बुजुर्ग भी अपना काफी समय मोबाइल पर रील्स देखने, लूडो खेलने, वीडियो कॉल करने और सोशल मीडिया चलाने में बिताने लगे हैं। हालांकि सीमित उपयोग फायदेमंद हो सकता है, लेकिन अगर यह आदत पूरे दिन की दिनचर्या बन जाए तो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट डॉ. मेघा अग्रवाल के अनुसार, अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए स्मार्टफोन कुछ हद तक मददगार साबित हो सकता है, लेकिन घंटों तक स्क्रीन पर समय बिताना चिंता का विषय बन सकता है।
सीमित इस्तेमाल हो सकता है फायदेमंद
डॉ. मेघा अग्रवाल का कहना है कि यदि बुजुर्ग अपने परिवार या दोस्तों के साथ ऑनलाइन लूडो खेलते हैं, वीडियो कॉल के जरिए जुड़े रहते हैं, व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं या कोई नया ऐप सीखते हैं, तो इससे उनका दिमाग सक्रिय रहता है। खासतौर पर जो लोग अकेले रहते हैं, उनके लिए स्मार्टफोन सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी बन सकता है।
कब शुरू होती है परेशानी?
समस्या तब शुरू होती है जब मोबाइल पूरे दिन का मुख्य काम बन जाता है। अगर कोई बुजुर्ग घंटों तक लगातार रील्स देखते रहें, सैर करना छोड़ दें, परिवार के लोगों से बातचीत कम कर दें या देर रात तक फोन इस्तेमाल करें, तो इसका असर उनकी सेहत पर पड़ने लगता है।
एक्सपर्ट के मुताबिक, लगातार स्क्रीन देखने से शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं, नींद प्रभावित होती है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी घट सकती है। इतना ही नहीं, लगातार कंटेंट देखने के बावजूद कई लोगों में अकेलापन और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है।
क्या है डिजिटल डिमेंशिया?
आजकल ‘डिजिटल डिमेंशिया’ शब्द भी काफी सुनने को मिलता है। हालांकि, एक्सपर्ट के अनुसार यह कोई आधिकारिक मेडिकल बीमारी या मान्यता प्राप्त डायग्नोसिस नहीं है। आमतौर पर इसका इस्तेमाल ऐसी स्थिति के लिए किया जाता है, जब स्क्रीन पर अत्यधिक निर्भरता के कारण याददाश्त, ध्यान और फोकस प्रभावित होने लगे तथा व्यक्ति दिमाग का सामान्य तरीके से उपयोग कम करने लगे।
फोन छीनना नहीं, संतुलन बनाना जरूरी
डॉ. मेघा अग्रवाल का कहना है कि स्मार्टफोन पूरी तरह बंद कराने की जरूरत नहीं है। सीमित समय तक लूडो खेलना, वीडियो कॉल करना या उपयोगी जानकारी देखना ठीक है। लेकिन इसके साथ नियमित वॉक, परिवार और दोस्तों से बातचीत, समय पर नींद और अन्य मानसिक व शारीरिक गतिविधियां भी दिनचर्या का हिस्सा होनी चाहिए।
नींद पर पड़ सकता है असर
बढ़ती उम्र में वैसे ही नींद की अवधि कम होने लगती है। ऐसे में अगर देर रात तक मोबाइल का इस्तेमाल किया जाए तो नींद का पैटर्न और अधिक बिगड़ सकता है। मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करती है, जो अच्छी नींद के लिए जरूरी होता है।
मेलाटोनिन का स्तर कम होने पर देर से नींद आना, रात में बार-बार नींद खुलना और अनिद्रा जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लंबे समय तक ऐसी स्थिति रहने पर हृदय स्वास्थ्य और याददाश्त पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
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