मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक हालात दुनिया भर के देशों के लिए चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। खासकर मिडिल ईस्ट में ईरान और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास मंडराते संकट के बीच, ग्लोबल एनर्जी मार्केट में चीन के एक नए और आक्रामक रूप ने भारत की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। चीन की तेल से जुड़ी नीतियां अब सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा बनती जा रही हैं।
दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक के रूप में चीन ने वैश्विक तेल बाजार में खुद को एक ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां वह अपनी सुविधा के अनुसार बाजार की दिशा तय कर सकता है:
सस्ते में भारी स्टॉक: जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें गिरती हैं, चीन इसका पूरा फायदा उठाता है। वह बड़ी आक्रामकता के साथ सस्ते तेल की रिकॉर्ड खरीदारी करता है और उसे अपने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) में डंप (सुरक्षित भंडार) कर लेता है।
संकट के समय मांग में कटौती: जब पश्चिम एशिया में तनाव (जैसे ईरान-होर्मुज संकट) के कारण तेल के दाम आसमान छूने लगते हैं, तब चीन अपने विशालकाय भंडारों का इस्तेमाल करना शुरू कर देता है। ऐसे वक्त में वह वैश्विक बाजार से नया तेल खरीदना या तो बहुत कम कर देता है या रोक देता है।
कीमतों पर दबदबा: चीन की इस रणनीति से वैश्विक तेल बाजार में एक अजीब संतुलन बन जाता है। वह कीमतों को नीचे गिरने से तो रोक लेता है, लेकिन संकट के समय बाजार की मांग को अचानक गिराकर ग्लोबल ट्रेड को अस्थिर कर देता है।
भारत के लिए क्यों बढ़ रही है चिंता?
चीन की इन हरकतों का सबसे बुरा असर भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:
होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता: भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों (तेल और गैस) का एक बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। यह सारा तेल मुख्य रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भारत पहुंचता है। ईरान और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण इस समुद्री मार्ग पर हमेशा तलवार लटकी रहती है।
रणनीतिक भंडारों की कमी: चीन के पास आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए बहुत बड़ा तेल भंडार है। इसके विपरीत, भारत के पास सीमित रणनीतिक भंडार ही हैं। संकट के समय चीन तो अपने रिजर्व के सहारे निकल जाता है, लेकिन भारत को महंगे दामों पर ही तेल खरीदना पड़ता है।
महंगाई और बढ़ता आयात बिल: जब वैश्विक स्तर पर चीन अपनी रणनीति के तहत बाजार को नियंत्रित करता है, तो भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं। इससे देश का आयात बिल (Import Bill) बढ़ता है और घरेलू बाजार में महंगाई का खतरा पैदा हो जाता है।
ईरान-होर्मुज संकट के बीच चीन का तेल बाजार पर इस तरह का एकाधिकार और ‘स्विंग बायर’ की भूमिका निभाना भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी है। इस स्थिति से निपटने के लिए भारत को अपनी ऊर्जा रणनीतियों में तेजी से बदलाव करने की जरूरत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी निर्भरता एक ही क्षेत्र पश्चिम एशिया से हटाकर वैकल्पिक स्रोतों पर बढ़ानी होगी। इसके साथ ही, देश के भीतर रणनीतिक तेल भंडारों की क्षमता को तेजी से बढ़ाना और घरेलू स्तर पर एनर्जी एक्सप्लोरेशन को गति देना ही भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एकमात्र पुख्ता उपाय है।
लखनऊ। यूपी टी-20 लीग सीजन-4 के ट्रॉफी टूर के दौरान मंगलवार को लीग की ट्रॉफी…
इस स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की सुरक्षा सिर्फ पहरेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि…
लखनऊ । यूपी टी-20 लीग सीजन-4 की तैयारियां अंतिम दौर में पहुंच गई हैं। लीग…
कपड़े धोते समय जेब में रखा नोट भीगकर गल जाना या पुराना होकर बीच से…
सीरिया के इतिहास में मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को एक बड़ा और ऐतिहासिक न्याय प्रणाली…
क्विक कॉमर्स डिलीवरी प्लेटफॉर्म ब्लिंकइट (Blink Commerce Pvt. Ltd.) पर महाराष्ट्र राज्य खाद्य एवं औषधि…