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भारत, रूसी तेल और ट्रंप का दावा… ऊपर से अमेरिकी सोशल मीडिया पर बैन-पुतिन ने चला बड़ा दांव

अमेरिका इन दिनों भारत पर व्यापारिक दबाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। हाल ही में वॉशिंगटन ने टैरिफ के जरिए नई शर्तें लागू कीं। हालांकि लंबे समय से लंबित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर नरमी के संकेत भी दिए गए। इस बीच विपक्ष ने इस डील पर सवाल उठाए हैं, लेकिन कूटनीतिक हलचल यहीं नहीं रुकती।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों से अमेरिका और वेनेजुएला से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने पर विचार करने को कहा है। यह निर्देश हालिया ट्रेड डील के बाद सामने आया है। समझौते की घोषणा करते समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि भारत रूसी तेल का आयात पूरी तरह बंद करने पर सहमत हुआ है। हालांकि इस दावे की भारत की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, तेल कंपनियों को स्पॉट मार्केट में टेंडर के जरिए खरीदारी करते समय अमेरिकी कच्चे तेल को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है। वहीं वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाने की बात भी कही गई है, जो व्यापारियों के साथ निजी बातचीत के माध्यम से संभव हो सकता है।

रूस का सख्त संदेश

इसी बीच रूस ने इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संसद को संबोधित करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के अलावा किसी भारतीय नेता ने यह नहीं कहा है कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद करेगा।

एक सांसद के सवाल के जवाब में लावरोव ने कहा,
“डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के रूसी तेल न खरीदने की सहमति की बात कही है, लेकिन मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या किसी अन्य भारतीय नेता की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक बयान नहीं सुना है।”

रूस का यह बयान कई मायनों में अहम माना जा रहा है। यह संकेत देता है कि मॉस्को अब भी भारत को एक स्वतंत्र ऊर्जा साझेदार के रूप में देख रहा है और अमेरिकी दावों को सार्वजनिक रूप से चुनौती दे रहा है।

डिजिटल मोर्चे पर भी सख्ती

तेल कूटनीति के साथ-साथ रूस ने डिजिटल क्षेत्र में भी अमेरिका से जुड़े प्लेटफॉर्म्स पर सख्ती दिखाई है। टेलीग्राम पर प्रतिबंध लगाने के बाद अब व्हाट्सऐप, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्रमुख अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की पहुंच पर भी रोक लगाए जाने की खबरें सामने आई हैं।

इस कदम को विदेशी टेक कंपनियों पर दबाव बनाने और डिजिटल नियंत्रण मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

आगे क्या?

विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत रूस से तेल आयात जारी रखता है, तो यह अमेरिका के लिए कूटनीतिक असहजता पैदा कर सकता है। वहीं रूस का सार्वजनिक बयान और डिजिटल सख्ती यह संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक शक्ति संतुलन में नए समीकरण बन रहे हैं।

अब बड़ा सवाल यही है—क्या यह सिर्फ बयानबाज़ी है या फिर अमेरिका, रूस और भारत के बीच एक नई भू-राजनीतिक शतरंज शुरू हो चुकी है?

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