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चाबहार से भारत की चुपचाप विदाई ! क्या ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति की भेंट चढ़ गई 23 साल की कूटनीति ?

अमेरिकी प्रतिबंधों की सख्ती ने भारत को एक बार फिर कठिन कूटनीतिक मोड़ पर ला खड़ा किया है। ईरान के चाबहार बंदरगाह से भारत की लगभग पूरी तरह से निकासी अब साफ नजर आने लगी है। जिस चाबहार को भारत पाकिस्तान को बाइपास करने, अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक सीधी पहुंच के रणनीतिक रास्ते के तौर पर देखता था, वही प्रोजेक्ट अब डोनाल्ड ट्रंप की “मैक्सिमम प्रेशर” नीति की भेंट चढ़ गया है। भारत पहले ही इस परियोजना में 120 मिलियन डॉलर ईरान को दे चुका है, लेकिन अब बंदरगाह का संचालन पूरी तरह ईरान अपने हाथ में लेगा। इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) के सरकारी निदेशकों का एक साथ इस्तीफा और कंपनी की वेबसाइट का बंद होना इस पीछे हटने की कहानी को और पुख्ता करता है।

चाबहार क्यों था भारत के लिए इतना अहम

चाबहार बंदरगाह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी पर स्थित है और भारत के लिए यह सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार जैसा था। इसका मकसद पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का मुकाबला करना था। 2016 में भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के बाद 2018 में भारत ने IPGL के जरिए शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन शुरू किया। मई 2024 में तो 10 साल का नया करार भी हुआ, जिसमें 120 मिलियन डॉलर के उपकरण और 250 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन का वादा किया गया। चाबहार इंटरनेशनल नॉर्थ–साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का अहम हिस्सा था, जो भारत को मध्य एशिया, रूस और यूरोप से जोड़ता है। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से इसकी पूरी क्षमता कभी इस्तेमाल ही नहीं हो पाई।

अमेरिकी प्रतिबंध और ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति

2018 से ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू हैं, लेकिन लंबे समय तक चाबहार को अफगानिस्तान के हितों के नाम पर छूट मिली रही। यह छूट सितंबर 2025 में खत्म कर दी गई। भारत को सिर्फ छह महीने का वक्त दिया गया ताकि वह अपनी गतिविधियां समेट सके। जनवरी 2026 में ट्रंप ने साफ कर दिया कि ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर अमेरिका से व्यापार में 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगेगा। भारत के लिए यह बड़ा खतरा था, क्योंकि अमेरिका के साथ उसका व्यापार ईरान की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा है। ऐसे में चाबहार पर टिके रहना आर्थिक और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर महंगा पड़ सकता था।

रणनीतिक झटका या मजबूरी में समझौता?

भारत ने पहले ही 120 मिलियन डॉलर ट्रांसफर कर दिए थे और कोई बकाया नहीं बचा। चाबहार में भारत की कोई स्थायी संपत्ति भी नहीं थी, संचालन ईरानी कर्मचारियों के भरोसे था। जैसे ही प्रतिबंधों का खतरा बढ़ा, IPGL के सभी सरकारी निदेशकों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया ताकि व्यक्तिगत प्रतिबंधों से बचा जा सके। वेबसाइट बंद करना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। रणनीतिक तौर पर यह भारत के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि अब अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच मुश्किल और महंगी हो जाएगी। इसका फायदा चीन और पाकिस्तान को मिलता दिख रहा है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि चाबहार कोई साधारण बंदरगाह नहीं, बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच का अहम जरिया है, जिससे पाकिस्तान को बाइपास किया जा सकता है और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल को चुनौती मिलती है। उन्होंने आरोप लगते हुए कहा कि अमेरिका के हल्के दबाव में चाबहार से भारत की खामोश वापसी को विदेश नीति की बड़ी कमजोरी बताया और सवाल उठाया कि सरकार कब तक वॉशिंगटन को भारत के राष्ट्रीय हित तय करने देगी। खेड़ा ने कहा कि असली मुद्दा चाबहार या रूसी तेल नहीं, बल्कि यह है कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका को भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव बनाने की इजाजत क्यों दे रहे हैं।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कोई वैचारिक हार नहीं, बल्कि मजबूरी में लिया गया फैसला है। अगर भविष्य में ईरान पर प्रतिबंध हटते हैं या वहां राजनीतिक हालात बदलते हैं, तो भारत की वापसी की संभावना बनी रह सकती है। फिलहाल चाबहार से पीछे हटना भारत की विदेश नीति की उस चुनौती को दिखाता है, जहां उसे अमेरिका, ईरान और चीन जैसे विरोधी हितों के बीच संतुलन साधना पड़ता है। आगे भारत को नए वैकल्पिक रास्ते और रणनीतियां तलाशनी ही होंगी।

Gopal Singh

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