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WIFE से जबरन अप्राकृतिक संबंध का आरोप, HC ने गुरुग्राम के बिजनेसमैन को नहीं दी राहत, मामला आपको चौंका सकता है

गुजरात हाई कोर्ट ने गुरुग्राम के एक बिजनेसमैन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। इसके बाद यह मामला चर्चा में आ गया है और सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर काफी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

दरअसल, बिजनेसमैन की पत्नी ने उसके खिलाफ गंभीर यौन उत्पीड़न और दहेज उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। इन आरोपों के बाद मामला अदालत तक पहुंचा, जहां गुजरात हाई कोर्ट ने आरोपी को बड़ा झटका देते हुए उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला ने अपने पति के साथ-साथ सास और ससुर पर भी दहेज की मांग और शोषण जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। महिला का आरोप है कि शादी के दौरान उसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाए गए।

इसके अलावा, महिला ने यह भी आरोप लगाया है कि उसके पति ने उसके साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए। मामला यहीं नहीं रुका, महिला ने अपने ससुर पर भी छेड़छाड़ का आरोप लगाया है। उसका कहना है कि इन आरोपों के बावजूद पति ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

मामले की सुनवाई के दौरान गुजरात हाई कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी का रिश्ता किसी भी व्यक्ति को दूसरे की शारीरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं देता। इसी आधार पर कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

शिकायत के अनुसार, महिला की शादी वर्ष 2022 में हुई थी। यह उसकी पहली शादी बताई गई है, जबकि आरोपी की यह दूसरी शादी है। महिला ने दावा किया है कि आरोपी की पहली पत्नी ने भी इसी तरह के आरोप लगाए थे, जिससे उसके कथित व्यवहार का एक पैटर्न सामने आता है।

गिरफ्तारी की आशंका के चलते आरोपी ने गुजरात हाई कोर्ट का रुख करते हुए अग्रिम जमानत की मांग की। याचिका में उसने खुद को गुरुग्राम का एक प्रतिष्ठित व्यवसायी बताया और सभी आरोपों को निराधार तथा वैवाहिक विवाद से प्रेरित करार दिया।

वहीं, पत्नी की ओर से पेश वकील ने अदालत में आरोपों की गंभीरता और कथित उत्पीड़न का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि मामला बेहद संवेदनशील है और इसकी गंभीरता को देखते हुए आरोपी को राहत नहीं दी जानी चाहिए।

जस्टिस डी. ए. जोशी ने अपने आदेश में कहा कि आधुनिक कानूनी व्यवस्था में शारीरिक स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है, भले ही संबंध वैवाहिक ही क्यों न हों। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरंग संबंध तभी स्वीकार्य हैं, जब वे आपसी सहमति और सम्मान पर आधारित हों। किसी की इच्छा के विरुद्ध बनाए गए संबंध न सिर्फ शारीरिक पीड़ा पहुंचाते हैं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक क्षति भी देते हैं।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि कोई महिला बिना ठोस वजह के ऐसे संवेदनशील आरोप सार्वजनिक मंच पर नहीं लाती। रिकॉर्ड के अवलोकन से यह तथ्य सामने आया कि आरोपी की पहली पत्नी ने भी इसी तरह के आरोप लगाए थे, जिससे यह मामला किसी एक घटना तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि कथित तौर पर दोहराए गए व्यवहार की ओर संकेत करता है।

इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए गुजरात हाई कोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

news desk

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