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Reading: पारसी समुदाय में शव न जलता है, न दफनाया जाता है! ‘टावर ऑफ साइलेंस’ में आखिर क्या होता है अंतिम संस्कार का ये अनोखा तरीका?
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Indian Press House > Blog > धर्म > पारसी समुदाय में शव न जलता है, न दफनाया जाता है! ‘टावर ऑफ साइलेंस’ में आखिर क्या होता है अंतिम संस्कार का ये अनोखा तरीका?
धर्म

पारसी समुदाय में शव न जलता है, न दफनाया जाता है! ‘टावर ऑफ साइलेंस’ में आखिर क्या होता है अंतिम संस्कार का ये अनोखा तरीका?

vineet verma
Last updated: September 29, 2026 10:17 am
vineet verma
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नई दिल्ली: भारत में अलग-अलग धर्मों और समुदायों में अंतिम संस्कार की परंपराएं अलग-अलग हैं। पारसी समुदाय की अंतिम संस्कार परंपरा इनमें बेहद अलग मानी जाती है। पारंपरिक जोरोएस्ट्रियन मान्यता के अनुसार मृत शरीर को न तो जलाया जाता है और न ही जमीन में दफनाया जाता है। इसके बजाय शव को एक विशेष ऊंची और खुली संरचना में रखा जाता है, जिसे दखमा कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे ‘टावर ऑफ साइलेंस’ के नाम से जाना जाता है।

Contents
क्या है ‘टावर ऑफ साइलेंस’?शव को जलाते या दफनाते क्यों नहीं हैं?अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कैसे होती है?गिद्धों की संख्या घटने से आई चुनौती

क्या है ‘टावर ऑफ साइलेंस’?

दखमा आमतौर पर गोल आकार की ऊंची संरचना होती है। पारंपरिक व्यवस्था में मृत शरीर को यहां खुले में रखा जाता है, जहां वह सूर्य, हवा और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के संपर्क में रहता है। ऐतिहासिक रूप से गिद्ध जैसे मांसाहारी पक्षी भी इस प्रक्रिया में भूमिका निभाते रहे हैं।

समय के साथ शरीर के अवशेष हड्डियों में बदलते हैं। इसके बाद उन्हें दखमा के मध्य हिस्से में बने स्थान पर रखा जाता है, जहां प्राकृतिक तरीके से उनका विघटन होता है।

शव को जलाते या दफनाते क्यों नहीं हैं?

इसके पीछे जोरोएस्ट्रियन धर्म की धार्मिक मान्यताएं हैं। इस परंपरा में धरती, पानी और अग्नि को पवित्र माना जाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार मृत शरीर को इन प्राकृतिक तत्वों के संपर्क में लाकर उन्हें अपवित्र नहीं किया जाना चाहिए।

इसी धार्मिक विश्वास के कारण शव को जमीन में दफनाने या अग्नि में जलाने के बजाय उसके प्राकृतिक तरीके से विघटन की व्यवस्था अपनाई गई।

अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कैसे होती है?

मृत व्यक्ति के शरीर को धार्मिक रीति-रिवाजों और प्रार्थनाओं के बाद दखमा तक ले जाया जाता है। पारंपरिक व्यवस्था के तहत शव को वहां निर्धारित स्थान पर रखा जाता है और फिर उसे प्राकृतिक तत्वों के संपर्क में छोड़ दिया जाता है।

पुराने विवरणों में बताया गया है कि दखमा के भीतर पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए अलग-अलग हिस्से होते थे।

गिद्धों की संख्या घटने से आई चुनौती

समय के साथ इस परंपरा के सामने नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। खासतौर पर भारत में गिद्धों की संख्या में भारी कमी आने के कारण कुछ दखमाओं में शवों के प्राकृतिक रूप से जल्दी विघटित होने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है।

इसी वजह से आधुनिक समय में इस परंपरा की व्यवस्था पहले जैसी नहीं रही। अलग-अलग स्थानों पर परिस्थितियों के अनुसार इसमें व्यवस्थागत और प्रक्रियागत बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

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