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कबूतर आखिर अपना रास्ता कैसे नहीं भूलते? 100 साल पुराना रहस्य खुला, सामने आया ‘नेचुरल GPS’ का चौंकाने वाला सच

नई दिल्ली: क्या आपने कभी सोचा है कि कबूतर सैकड़ों किलोमीटर दूर से भी अपने घर तक बिना भटके कैसे पहुंच जाते हैं? हजारों सालों से इंसान कबूतरों का इस्तेमाल संदेश भेजने के लिए करता आया है, लेकिन उनकी दिशा पहचानने की क्षमता हमेशा वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य बनी रही। अब एक नई रिसर्च ने इस पहेली से पर्दा हटाने का दावा किया है और कबूतरों के “नेविगेशन सिस्टम” को लेकर चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है।

कबूतरों का ‘GPS’ आखिर काम कैसे करता है?

वैज्ञानिकों के मुताबिक कबूतर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को एक प्राकृतिक कंपास की तरह इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह सवाल लंबे समय तक अनसुलझा रहा कि वे इस चुंबकीय संकेत को आखिर पहचानते कैसे हैं। पहले माना जाता था कि उनकी आंखें या चोंच इस प्रक्रिया में भूमिका निभाती हैं, लेकिन अब नई स्टडी ने एक अलग ही दिशा में इशारा किया है।

लीवर में छिपा था कबूतरों का असली रहस्य

जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक मार्टिन विकेल्स्की और उनकी टीम की रिसर्च में दावा किया गया है कि कबूतरों के लीवर (जिगर) में चुंबकीय संकेतों को पकड़ने की क्षमता हो सकती है। लीवर की खास इम्यून कोशिकाएं आयरन को स्टोर करती हैं, जो चुंबकीय क्षेत्र को महसूस करने में मदद कर सकता है।

वैज्ञानिकों ने जब इन कोशिकाओं को अस्थायी रूप से हटाया, तो कबूतर अपनी दिशा खो बैठे और घर तक वापस नहीं लौट पाए। इस प्रयोग ने यह संकेत दिया कि कबूतरों के नेविगेशन सिस्टम में लीवर की भूमिका बेहद अहम हो सकती है।

बादलों में क्यों बिगड़ जाता है कबूतरों का रास्ता?

रिसर्च में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया है। जब आसमान में घने बादल होते हैं, तो कबूतरों की दिशा पहचानने की क्षमता कमजोर हो जाती है। इसका कारण यह माना जा रहा है कि ऐसे समय में वे सूर्य की स्थिति का सहारा नहीं ले पाते और पूरी तरह चुंबकीय संकेतों पर निर्भर हो जाते हैं।

इससे यह भी संकेत मिलता है कि कबूतर केवल एक नहीं बल्कि कई नेविगेशन सिस्टम का उपयोग करते हैं।

क्या सिर्फ चुंबकीय क्षेत्र ही है वजह?

वैज्ञानिकों का मानना है कि कबूतरों की दिशा पहचानने की क्षमता केवल एक तकनीक पर निर्भर नहीं है। वे पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के साथ-साथ सूर्य की स्थिति, वातावरणीय संकेतों और संभवतः अन्य प्राकृतिक संकेतों का भी उपयोग करते हैं।

इस जटिल प्रणाली के कारण ही वे लंबी दूरी तय करने के बावजूद अपने गंतव्य तक आसानी से पहुंच जाते हैं।

सिर्फ कबूतर ही नहीं, अन्य जीव भी कर सकते हैं GPS का इस्तेमाल

विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षमता केवल कबूतरों तक सीमित नहीं हो सकती। चूहे और कई अन्य पक्षियों व जीवों में भी इसी तरह की चुंबकीय संवेदन क्षमता हो सकती है।

हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि इस शोध को अभी और गहराई से समझने और पुष्टि करने की जरूरत है, क्योंकि यह विषय अभी भी पूरी तरह से रहस्यों से भरा हुआ है।

क्यों खास है यह खोज?

यह रिसर्च इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह पहली बार है जब कबूतरों की दिशा पहचानने की क्षमता को लेकर एक संभावित “पूर्ण थ्योरी” सामने आई है। इससे न सिर्फ पक्षियों के व्यवहार को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि भविष्य में नेविगेशन और वैज्ञानिक तकनीकों में भी नए रास्ते खुल सकते हैं।

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