उज्जैन: रक्षाबंधन को भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने के संकल्प का पर्व माना जाता है। सावन की पूर्णिमा के दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके सुख, स्वास्थ्य व समृद्धि की कामना करती है। बदले में भाई बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है। हालांकि, राखी का इतिहास केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं है। इससे जुड़ी कई पौराणिक कथाएं, लोकमान्यताएं और ऐतिहासिक प्रसंग हैं, जिन्होंने समय के साथ इस पर्व के अर्थ को भी व्यापक बनाया है।
रक्षाबंधन शब्द को संस्कृत के दो शब्दों रक्षा और बंधन से बना माना जाता है। इसका सीधा अर्थ सुरक्षा का बंधन है। इस दिन बहन भाई को तिलक लगाकर उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और उसकी मंगलकामना करती है।
हालांकि, राखी की परंपरा सिर्फ सगे भाई-बहन तक सीमित नहीं रही। कई जगह चचेरे-ममेरे भाई-बहनों, रिश्तेदारों और मित्रों को भी राखी बांधने की परंपरा देखने को मिलती है। समय के साथ यह त्योहार केवल भाई की ओर से बहन की रक्षा के वादे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रेम, सम्मान, जिम्मेदारी और रिश्तों की मजबूती का प्रतीक भी बन गया।
रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित कथाओं में भगवान कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग शामिल है। महाभारत की प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार कृष्ण की उंगली में चोट लगने से खून निकलने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया।
मान्यता है कि द्रौपदी के इस स्नेह को कृष्ण ने हमेशा याद रखा। बाद में जब द्रौपदी का चीरहरण हुआ तो कृष्ण ने उसकी लाज बचाई। इसी प्रसंग को राखी के धागे में छिपे प्रेम, विश्वास और रक्षा की भावना से जोड़ा जाता है।
राखी से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके राज्य की रक्षा करने लगे।
कथा के मुताबिक, माता लक्ष्मी विष्णु से अलग नहीं रहना चाहती थीं। श्रावण पूर्णिमा के दिन उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई बताया। इसके बाद बलि ने उन्हें उपहार मांगने को कहा। माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ लौटने देने की इच्छा जताई, जिसे राजा बलि ने स्वीकार कर लिया। इस कथा को भी श्रावण पूर्णिमा पर राखी बांधने की परंपरा से जोड़ा जाता है।
रक्षाबंधन से जुड़ी एक लोकप्रचलित कथा मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना से भी संबंधित है। कहा जाता है कि यमुना ने यमराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उनकी लंबी उम्र की कामना की।
मान्यता है कि यमराज अपनी बहन के स्नेह से प्रसन्न हुए और उन्होंने यमुना को वरदान दिया। इस कथा में राखी को भाई की लंबी उम्र और बहन की मंगलकामना से जोड़कर देखा जाता है।
एक अन्य पौराणिक कथा देवताओं के राजा इंद्र और उनकी पत्नी शुचि से जुड़ी है। कथा के अनुसार, देवासुर संग्राम के दौरान इंद्र संकट में थे। तब गुरु बृहस्पति की सलाह पर शुचि ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।
इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय हासिल की। इस कथा में रक्षा सूत्र को सुरक्षा, शक्ति और विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
रक्षाबंधन से जुड़ी एक लोकप्रिय ऐतिहासिक कथा सिकंदर की पत्नी और भारतीय शासक राजा पुरु से संबंधित है। प्रचलित कथा के अनुसार, सिकंदर की पत्नी ने राजा पुरु को राखी भेजकर उन्हें अपना भाई बनाया था।
इसके बाद सिकंदर और राजा पुरु के बीच युद्ध हुआ। लोककथा में कहा जाता है कि राजा पुरु ने राखी के रिश्ते का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया। हालांकि, इस पूरे प्रसंग को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। इसलिए इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय प्रचलित कथा के रूप में देखना अधिक उचित माना जाता है।
रक्षाबंधन की एक और चर्चित कहानी मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं से जुड़ी है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, संकट के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी और सहायता की अपील की थी।
कहा जाता है कि हुमायूं ने राखी के रिश्ते का सम्मान करते हुए रानी की मदद के लिए कदम उठाया। हालांकि, इस घटना के ऐतिहासिक प्रमाण और पूरे घटनाक्रम को लेकर भी इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं।
राखी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आधुनिक प्रसंग 1905 में हुए बंगाल विभाजन के विरोध से संबंधित है। ब्रिटिश सरकार के इस फैसले के दौर में रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करने का आह्वान किया था।
कहा जाता है कि कोलकाता, ढाका और चटगांव जैसे क्षेत्रों में लोगों ने एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर सामाजिक एकता का संदेश दिया। इस तरह राखी का अर्थ पारिवारिक रिश्ते से आगे बढ़कर सामाजिक सद्भाव और एकजुटता से भी जुड़ गया।
रक्षाबंधन के दिन आमतौर पर बहन पूजा की थाली तैयार करती है। इसमें राखी के साथ कुमकुम या सिंदूर, अक्षत, मिठाई और दीपक रखा जाता है।
बहन भाई को तिलक लगाती है, उसकी आरती करती है और दाहिनी कलाई पर राखी बांधती है। इसके बाद भाई को मिठाई खिलाई जाती है। भाई बहन को उपहार देता है और उसके सुख-सुरक्षा के लिए साथ खड़े रहने का संकल्प लेता है।
समय के साथ राखियों के स्वरूप में भी बदलाव आया है। पारंपरिक धागों के अलावा चांदी, सोने, मोतियों, रुद्राक्ष और अलग-अलग तरह की डिजाइन वाली राखियां भी चलन में हैं।
श्रावण पूर्णिमा का संबंध केवल रक्षाबंधन से नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस दिन कई क्षेत्रीय परंपराएं और पर्व मनाए जाते हैं।
महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में नारली पूर्णिमा के अवसर पर मछुआरा समुदाय समुद्र देवता वरुण की पूजा करता है और समुद्र में नारियल अर्पित करता है।
दक्षिण भारत के कुछ ब्राह्मण समुदायों में इस दिन यज्ञोपवीत बदलने की परंपरा है, जिसे उपाकर्म भी कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में कजरी पूर्णिमा से जुड़ी परंपराएं हैं। इसमें कजरी गीत, पूजा और अच्छी फसल की कामना की जाती है।
पश्चिम बंगाल और ओडिशा में झूलन पूर्णिमा मनाई जाती है, जो राधा-कृष्ण से जुड़ा पर्व है। इस दौरान भगवान को फूलों से सजाए गए झूले पर विराजमान किया जाता है।
श्रावण पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के रूप में मनाने की परंपरा भी है। वर्ष 1969 में इसे संस्कृत दिवस घोषित किया गया था।
रक्षाबंधन की खासियत यही है कि समय के साथ इसके मायने भी व्यापक होते गए। पौराणिक कथाओं में जहां यह रक्षा और आशीर्वाद से जुड़ा दिखाई देता है, वहीं आधुनिक समय में यह भाई-बहन के स्नेह, सम्मान, आपसी जिम्मेदारी और सामाजिक एकता का प्रतीक भी बन चुका है। राखी का धागा छोटा जरूर है, लेकिन इससे जुड़े भाव विश्वास, स्नेह, सम्मान और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने के वादे तक फैले हुए हैं।
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