बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय
कहते हैं—कुछ गीत केवल सुरों में नहीं, आत्मा में बसते हैं. ऐसा ही एक गीत है ‘वंदे मातरम्’, जिसने भारत की आज़ादी की लड़ाई में लाखों दिलों को एक किया. वर्ष 1875 में अक्षय नवमी के दिन बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने यह गीत रचा था, जो बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल हुआ. “वंदे मातरम्”—माँ, मैं तेरी वंदना करता हूँ—इन शब्दों ने मातृभूमि को देवी के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया.
1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन के दौरान यही गीत स्वदेशी आंदोलन की आत्मा बन गया. सड़कों पर, सभाओं में और जेलों के भीतर तक “वंदे मातरम्” की गूंज आज़ादी की लहर बन गई. ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित किया, पर भारतीयों के दिलों से इसकी आवाज़ कभी नहीं मिट सकी.
‘ऐतिहासिक है आज का दिन’ -पीएम मोदी
पीएम मोदी ने एक्स पर देशवासियों को संबोधित करते हुए लिखा कि ‘7 नवंबर का दिन देशवासियों के लिए ऐतिहासिक होने जा रहा है. हम वंदेमातरम् गान के गौरवशाली 150 वर्षों का उत्सव मनाने जा रहे हैं. यह वो प्रेरक आह्वान है, जिसने देश की कई पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत किया है.’
यह राष्ट्रीय स्मरणोत्सव 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक चलेगा. वर्षभर के दौरान विभिन्न राज्यों में सांस्कृतिक, शैक्षणिक और जनसहभागिता वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें स्कूलों, विश्वविद्यालयों और कला संस्थानों की सक्रिय भागीदारी रहेगी.
बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित वंदे मातरम् बना था देशभक्ति का प्रतीक
बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत 7 नवंबर 1875 को लिखा गया था. बाद में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बनकर पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ. भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में देशभक्ति की प्रेरणा देने वाले इस गीत को को 24 जनवरी 1950 को भारत के राष्ट्रगीत के रूप में औपचारिक रूप से अपनाया गया था. 150 वर्षों के बाद भी यह गीत आज भी देशभक्ति और राष्ट्रगौरव की प्रेरणा देता है.
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