नई दिल्ली: इन दिनों ‘कॉकरोच’ शब्द सिर्फ एक कीड़े तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में भी लगातार सुर्खियां बटोर रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि धरती पर करोड़ों वर्षों से मौजूद यह जीव आखिर दुनिया के लगभग हर कोने तक कैसे पहुंचा? वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक, आज घरों, अस्पतालों, होटलों और दफ्तरों में दिखाई देने वाले कई कॉकरोचों की जड़ें दक्षिण एशिया, खासकर भारत और म्यांमार से जुड़ी हुई हैं।
कॉकरोच को दुनिया के सबसे जीवट जीवों में गिना जाता है। माना जाता है कि इनके पूर्वज डायनासोरों के दौर से भी पहले धरती पर मौजूद थे। यही वजह है कि इन्हें सबसे अधिक अनुकूलन क्षमता वाले जीवों में शामिल किया जाता है। बदलते वातावरण, भोजन की कमी और कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की उनकी क्षमता वैज्ञानिकों को लंबे समय से आकर्षित करती रही है।
वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित एक व्यापक जीनोमिक अध्ययन में सामने आया कि आज जिस प्रजाति को ‘जर्मन कॉकरोच’ कहा जाता है, उसका मूल संबंध जर्मनी से नहीं बल्कि भारत, म्यांमार और बंगाल की खाड़ी के आसपास के क्षेत्रों से है। शोधकर्ताओं ने विभिन्न देशों और महाद्वीपों से जुटाए गए नमूनों के डीएनए विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला।
अध्ययन के अनुसार, लगभग 2100 वर्ष पहले कुछ एशियाई कॉकरोच मानव बस्तियों के अनुकूल होने लगे। समय के साथ उन्होंने जंगलों और प्राकृतिक आवासों के बजाय इंसानों के आसपास रहने की आदत विकसित कर ली। धीरे-धीरे वे पूरी तरह शहरी जीवन पर निर्भर प्रजाति बन गए।
शोध में यह भी सामने आया कि कॉकरोचों का वैश्विक विस्तार दो प्रमुख चरणों में हुआ। पहला विस्तार करीब 1200 साल पहले हुआ, जब दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच व्यापारिक संपर्क बढ़े। उस दौर में व्यापारिक मार्गों के जरिए ये कीट नए इलाकों तक पहुंचे।
दूसरा और सबसे बड़ा विस्तार लगभग 390 साल पहले औपनिवेशिक काल में हुआ। समुद्री व्यापार के बढ़ने के साथ ये कॉकरोच जहाजों में रखे खाद्य पदार्थों, लकड़ी के बक्सों और मालवाहक सामग्री के बीच छिपकर एशिया, अफ्रीका और यूरोप तक पहुंच गए। विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री व्यापार ने इनके लिए अनजाने में वैश्विक परिवहन नेटवर्क का काम किया।
18वीं शताब्दी में यूरोप में इस प्रजाति का व्यापक रूप से उल्लेख होने लगा। बाद में इसे ‘जर्मन कॉकरोच’ नाम दिया गया। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि यह प्रजाति जर्मनी की मूल निवासी है, लेकिन आधुनिक जीनोमिक शोध ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रजाति की वास्तविक उत्पत्ति दक्षिण एशिया में हुई थी और बाद में यह दुनिया भर में फैल गई। नाम जर्मन होने के बावजूद इसकी जैविक जड़ें भारत और म्यांमार क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि कॉकरोचों की सबसे बड़ी ताकत उनकी अनुकूलन क्षमता है। ये तेजी से प्रजनन करते हैं, सीमित संसाधनों में भी जीवित रह सकते हैं और समय के साथ कई कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं।
इसी वजह से दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में सफाई अभियानों और आधुनिक नियंत्रण तकनीकों के बावजूद कॉकरोच पूरी तरह खत्म नहीं हो पाए हैं। बदलती परिस्थितियों में खुद को ढालने की उनकी क्षमता उन्हें पृथ्वी के सबसे सफल जीवों में शामिल करती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि कॉकरोचों का इतिहास केवल एक कीट की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता, व्यापार और वैश्विक संपर्कों के विकास की कहानी भी बताता है। बंगाल की खाड़ी के आसपास की बस्तियों से निकलकर दुनिया के लगभग हर महाद्वीप तक पहुंचने वाला यह जीव मानव इतिहास के सबसे पुराने अनजाने ‘वैश्विक यात्रियों’ में गिना जाता है।
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