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दही-हांडी की मटकी में छिपा है कान्हा की बाल लीला का राज, जानिए कैसे शुरू हुआ ये रिवाज

आखिरकार वह दिन आ ही गया, जिसका भक्तों को पूरे साल बेसब्री से इंतजार रहता है। चारों ओर कान्हा के जयकारे, मंदिरों में भक्ति का माहौल और घर-घर जन्मोत्सव की तैयारियां… जी हां, बात हो रही है भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी की। इस पावन अवसर पर देशभर में कृष्ण जन्मोत्सव बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन जन्माष्टमी का जिक्र हो और दही-हांडी की बात न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? आखिर इस परंपरा के पीछे क्या कहानी है, यह कब शुरू हुई और क्यों आज भी इसे इतने उत्साह से मनाया जाता है? आइए जानते हैं दही-हांडी की इस खास परंपरा का इतिहास।

क्यों मनाई जाती है दही-हांडी की रस्म?

दही-हांडी का उत्सव भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और उनकी माखन चोरी की मनमोहक कथा की याद में मनाया जाता है। मान्यता है कि बाल कृष्ण अपने सखाओं के साथ मिलकर ऊंचाई पर टंगी मटकी से मक्खन निकालते थे।

गोपियां मक्खन को कृष्ण से बचाने के लिए मटकी को ऊंचाई पर लटका देती थीं, लेकिन कान्हा अपने सखाओं के साथ मानव पिरामिड बनाकर मटकी तक पहुंच जाते और उसे फोड़ देते थे। इसी बाल लीला को याद करते हुए जन्माष्टमी के अवसर पर गोविंदा मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर बंधी दही की मटकी फोड़ते हैं।

यह उत्सव श्रद्धा, उमंग और उल्लास के साथ-साथ एकता, भाईचारे, सहयोग, साहस और टीम वर्क का संदेश भी देता है।

कब से शुरू हुआ दही-हांडी का रिवाज?

दही-हांडी की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी मानी जाती है। हालांकि, आधुनिक सार्वजनिक उत्सव के रूप में इसकी शुरुआत वर्ष 1907 में महाराष्ट्र में हुई मानी जाती है।

यानी सार्वजनिक रूप से दही-हांडी की यह परंपरा करीब 119 वर्षों से चली आ रही है। समय के साथ यह उत्सव महाराष्ट्र के मुंबई, ठाणे और आसपास के क्षेत्रों में बेहद लोकप्रिय हुआ और धीरे-धीरे देश के कई अन्य हिस्सों तक फैल गया।

आज दही-हांडी जन्माष्टमी के प्रमुख आकर्षणों में शामिल है, जहां बड़ी संख्या में गोविंदा की टोलियां उत्साह और जोश के साथ मटकी फोड़ने में हिस्सा लेती हैं।

दही-हांडी सिर्फ मटकी फोड़ने की रस्म नहीं, बल्कि कान्हा की उन नटखट बाल लीलाओं को फिर से जीने का खूबसूरत अवसर है, जिनमें आज भी भक्तों को अपना बचपन और कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम दिखाई देता है। मटकी फोड़ते गोविंदाओं की हर कोशिश में उत्साह के साथ एक-दूसरे का साथ और भरोसा नजर आता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जब कदम एक साथ बढ़ते हैं, तो ऊंचाइयां भी छोटी लगने लगती हैं। यही दही-हांडी की असली भावना है।

news desk

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