रियाद/दुबई। इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का को निशाना बनाकर किए गए एक संदिग्ध हूती ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
हालांकि, सऊदी रक्षा प्रणाली ने समय रहते इस हमले को नाकाम कर दिया, लेकिन इस घटना ने यमन के हूती विद्रोहियों और ईरान समर्थित लड़ाकों से सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रॉयटर्स और क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगातार हो रहे हमलों के कारण सऊदी अरब के पास मिसाइल रक्षा प्रणाली (Air Defense Interceptors) का स्टॉक बेहद कम हो गया है।
हथियारों की कमी से जूझ रहे सऊदी अरब ने अपनी सीमाओं, तेल प्रतिष्ठानों और पवित्र स्थलों की सुरक्षा के लिए अब चार प्रमुख देशों-फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और मिस्र से तत्काल सैन्य सहायता और हवाई सुरक्षा सहयोग की गुहार लगाई है।
मक्का हमले से जुड़े 5 बड़े अपडेट्स:
- मक्का पर हमले की नाकाम कोशिश: सऊदी अरब ने बुधवार को दावा किया कि यमन की सीमा से करीब 1,100 किलोमीटर दूर स्थित मक्का को निशाना बनाने आए एक हूती ड्रोन को हवा में ही मार गिराया गया। सऊदी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि मक्का उनकी ‘रेड लाइन’ है।
- 4 मित्र देशों से मांगी मदद: रक्षा हथियारों के घटते स्टॉक को देखते हुए रियाद ने फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, पाकिस्तान और मिस्र से संपर्क कर अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को मजबूत करने के लिए मदद मांगी है।
- अमेरिका के पास भी हथियारों की कमी: सऊदी अरब का सबसे बड़ा सैन्य साझेदार अमेरिका, ईरान के साथ बीते छह महीनों से जारी क्षेत्रीय संघर्ष के चलते खुद इंटरसेप्टर मिसाइलों की सीमित आपूर्ति से जूझ रहा है। इसी वजह से अमेरिका ने प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बना रखी है।
- हूतियों ने आरोपों को नाकारा: यमन के हूती विद्रोहियों ने मक्का शहर को निशाना बनाने के आरोपों से इनकार किया है, हालांकि क्षेत्रीय तनाव में इस मोर्चे के खुलने से घबराहट का माहौल है।
- पाकिस्तान का राजनयिक समर्थन: मक्का पर हुए हमले के प्रयास की कड़ी निंदा करते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि उनका देश सऊदी अरब की संप्रभुता की रक्षा के लिए उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
तेल ठिकानों और पवित्र स्थलों पर बढ़ा खतरा
क्षेत्रीय विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी अरब इस वक्त बहुस्तरीय सुरक्षा संकट का सामना कर रहा है। देश को न केवल अपने रणनीतिक सैन्य अड्डों और सरकारी इमारतों की रक्षा करनी है, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को संभालने वाले अपने विशाल तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है।
सहयोगी देशों ने फिलहाल सऊदी अरब को कूटनीतिक और राजनयिक समर्थन दिया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कितनी जल्दी सैन्य मदद पहुंचती है, इस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।