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शिवलिंग पर सोना, चांदी या तांबा… किस धातु का नाग चढ़ाना होता है सबसे शुभ? दोष के अनुसार जानें सही नियम

नई दिल्ली: भगवान शिव की पूजा में जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन शिवलिंग पर धातु से बने नाग को अर्पित करने का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। मान्यता है कि भगवान शिव के गले में वासुकी नाग विराजमान रहते हैं, इसलिए उन्हें नागेश्वर भी कहा जाता है। ऐसे में श्रद्धापूर्वक शिवलिंग पर नाग अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग धातुओं के नाग अलग-अलग प्रकार के दोषों की शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति से जुड़े माने जाते हैं।

शिवलिंग पर नाग चढ़ाने का क्या माना जाता है महत्व?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को नाग अत्यंत प्रिय हैं। इसलिए शिवलिंग पर चांदी, तांबा या पीतल से बने नाग अर्पित करने से महादेव की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। विशेष रूप से जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष या राहु-केतु से जुड़े अशुभ योग बताए जाते हैं, उनके लिए नाग अर्पित करना शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से नाग समर्पित करने पर रुके हुए कार्य पूरे होने और मनोकामनाएं पूर्ण होने का आशीर्वाद मिलता है।

किस दोष में किस धातु का नाग चढ़ाना चाहिए?

यदि कुंडली में कालसर्प दोष या चंद्रमा से संबंधित दोष बताया गया हो, तो चांदी का नाग अर्पित करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे मानसिक शांति और सकारात्मकता प्राप्त होती है।

तांबे का नाग सौभाग्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए अर्पित किया जाता है। इसे भगवान शिव के तेज और ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है।

वहीं आर्थिक समृद्धि, व्यापार में उन्नति और करियर में सफलता की कामना रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए पीतल का नाग अर्पित करना शुभ माना जाता है।

शिवलिंग पर नाग अर्पित करने की सही विधि

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग पर नाग अर्पित करने के लिए सोमवार का दिन सबसे शुभ माना जाता है। सुबह स्नान करने के बाद धातु का नाग लेकर शिव मंदिर जाएं। सबसे पहले उसे गंगाजल से स्नान कराएं और फिर श्रद्धापूर्वक शिवलिंग पर स्थापित करें। इसके बाद ‘ॐ नागराजाय नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करें।

दोष निवारण के लिए रखें इस बात का विशेष ध्यान

यदि नाग अर्पित करने का उद्देश्य किसी विशेष कुंडली दोष, जैसे कालसर्प दोष या राहु-केतु से जुड़े अशुभ प्रभावों की शांति है, तो धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा-विधि मंदिर के पुजारी के मार्गदर्शन में कराना अधिक उचित माना जाता है।

vineet verma

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