नई दिल्ली। देश में मानसून की दस्तक के साथ ही भारी बारिश आफत बनकर बरस रही है। मूसलाधार बारिश ने न सिर्फ सड़कों को समंदर बना दिया है, बल्कि जर्जर और कमजोर इमारतों के लिए यह ‘डेथ वारंट’ साबित हो रही है। पिछले 24 घंटों में दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान से मकान व व्यावसायिक इमारतें ढहने के दर्दनाक हादसे सामने आए हैं। इन हादसों ने एक बार फिर मानसून से निपटने की प्रशासनिक तैयारियों और इमारतों के फिटनेस ऑडिट पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देश की राजधानी दिल्ली के रोहिणी इलाके में बुधवार को एक निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गई।
महाराष्ट्र के पुणे (पिंपरी-चिंचवड़) के मोशी इलाके में प्रकृति का सबसे खौफनाक रूप देखने को मिला। यहाँ भारी बारिश के कारण पास मौजूद कूड़े का एक विशाल पहाड़ भरभराकर वेस्ट-टू-एनर्जी प्रोजेक्ट की इमारत पर गिर गया।
प्रशासनिक सतर्कता की एक अच्छी मिसाल मध्य प्रदेश के जबलपुर से सामने आई। यहाँ के व्यस्त बाजार ‘बड़ा फुहारा’ इलाके में एक पुरानी पांच मंजिला व्यावसायिक इमारत भरभराकर गिर गई।
राजस्थान के अजमेर (किशनगढ़) में भी लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के चलते एक रिहायशी मकान ढह गया। मदनगंज थाना पुलिस और स्थानीय रेस्क्यू टीम ने तत्परता दिखाते हुए मलबे में फंसे परिवार के सभी सदस्यों को सकुशल बाहर निकाल लिया। हादसे के बाद प्रशासन ने अलर्ट जारी करते हुए लोगों से जर्जर मकानों को तुरंत खाली करने की अपील की है।
बड़ा सवाल: मानसून की पहली बारिश में ही दिल्ली से लेकर मुंबई तक जिस तरह जलभराव और इमारतें गिरने के हादसे हो रहे हैं, उसने नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के दावों की पोल खोल दी है। आखिर इन खतरनाक कंस्ट्रक्शन्स और जर्जर इमारतों पर मानसून से पहले कार्रवाई क्यों नहीं होती?
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