राष्ट्रमंडल खेलों के मंच पर जब तिरंगा फहराया और राष्ट्रगान की गूंज उठी, तो पोडियम पर खड़ीं मीराबाई चानू की आंखों से छलकते आंसू सिर्फ जीत के नहीं थे। यह आंसू थे चोटों से जंग, महीनों के कठोर त्याग और 48 किग्रा भार वर्ग में खुद को बनाए रखने के उस दर्द के, जिसे उन्होंने पिछले कई महीनों से झेला है।
ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाकर इतिहास रचने वाली टोक्यो ओलंपिक सिल्वर मेडलिस्ट मीराबाई चानू ने न सिर्फ गोल्ड की हैट्रिक लगाई, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि असली चैंपियन असफलताओं से कैसे वापसी करते हैं।
48kg कैटेगरी का कड़ा संघर्ष: वजन घटाना और नियंत्रित रखना रहा सबसे मुश्किल
31 वर्षीय मीराबाई चानू के लिए यह मेडल केवल बारबेल उठाने से कहीं ज्यादा बॉडी मैनेजमेंट की परीक्षा था। खिताबी मुकाबले के बाद मीराबाई ने खुद इस बात को स्वीकार किया।
“मेरे लिए यह प्रदर्शन बेहद खास और चुनौतीपूर्ण रहा, क्योंकि मैंने लंबे समय बाद अपने शरीर का वजन नियंत्रित किया है। 48 किलोग्राम वर्ग में खुद को बनाए रखना और बॉडी वेट कम करना मेरे लिए मानसिक और शारीरिक रूप से सबसे मुश्किल काम था।” मीराबाई चानू
पहले प्रयास में झटके से लेकर स्नैच के नए रिकॉर्ड तक: यूं पलटी बाजी
फाइनल मुकाबले का रोमांच किसी ड्रामा से कम नहीं था। स्नैच दौर में मीराबाई का पहला प्रयास (82 किग्रा) तकनीकी चूक की वजह से असफल रहा। दबाव चरम पर था, लेकिन मीराबाई और उनके कोच विजय शर्मा ने रणनीति बदली:
- कमबैक: दूसरे प्रयास में उन्होंने 82 किग्रा वजन उठाकर खुद को रेस में वापस लाया।
- न्यू रिकॉर्ड: तीसरे व अंतिम प्रयास में 85 किग्रा उठाकर उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स का नया रिकॉर्ड कायम कर दिया।
इसके बाद क्लीन एंड जर्क में तो चानू ने विरोधी लिफ्टर्स को काफी पीछे छोड़ दिया। पहली कोशिश में चूकने के बाद, उन्होंने दूसरी कोशिश में सीधे 105 किग्रा वजन उठाकर कॉम्पिटिशन एकतरफा कर दिया। उन्होंने कुल 190 किग्रा (85 स्नैच + 105 क्लीन एंड जर्क) वजन उठाकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया।
“परिवार का समर्थन और विजय सर का साथ नहीं होता, तो यहाँ न होती”
अपनी इस ऐतिहासिक हैट्रिक (गोल्ड कोस्ट 2018, बर्मिंघम 2022 और अब ग्लासगो 2026) का श्रेय मीराबाई ने अपने परिवार और कोच विजय शर्मा को दिया:
- फैमिली बैकअप: “चोटों और रिहैब के मुश्किल दौर में मेरे परिवार ने कभी मेरा हाथ नहीं छोड़ा। आज मैं जो कुछ भी हूं, उनकी बदौलत हूं।”
- कोच की रणनीति: “शुरुआत से ही विजय सर ने मेरी ट्रेनिंग, फोकस और परफॉर्मेंस को मेंटेन रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।”
प्रतिद्वंद्वियों ने भी माना लोहा: “मीराबाई सिर्फ चैंपियन नहीं, अच्छी दोस्त भी हैं”
मीराबाई के इस दबदबे की तारीफ उनकी राइवल्स ने भी की:
- रूथ असुकुओ न्योंग (नाइजीरिया – सिल्वर मेडलिस्ट, 168 किग्रा): “यह मेडल मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मैं मीराबाई को स्वर्ण पदक जीतने पर बधाई देती हूं, वह कमाल की एथलीट हैं।”
- आइरीन हेनरी (मलेशिया – ब्रॉन्ज मेडलिस्ट, 167 किग्रा): “हम पहले भी खेल चुके हैं और एक-दूसरे को इंस्टाग्राम पर फॉलो करते हैं। मीराबाई एक बेहतरीन इंसान और मेरी अच्छी दोस्त हैं।”
ग्लासगो के एरिना में मौजूद भारतीय फैंस भी मीराबाई के इस पावर-शो को देखकर गदगद नजर आए। जहां बाकी खिलाड़ी 80-90 किग्रा के आसपास संघर्ष कर रहे थे, वहीं मीराबाई का 105 किग्रा का लिफ्ट भारत के खेल इतिहास के सबसे यादगार लम्हों में दर्ज हो गया।