दुनिया भर में बढ़ती महंगाई के बीच अब खाने-पीने की चीजों की कीमतें भी चिंता बढ़ा रही हैं। अनाज, गेहूं, तेल और चीनी जैसी सभी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। इसका असर सिर्फ ग्लोबल मार्केट तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में आम लोगों के घरेलू बजट पर भी पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक खाद्य कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। हालांकि कीमतें अभी 2022 में देखे गए ऐतिहासिक उच्च स्तर से नीचे हैं, लेकिन जिस रफ्तार से इनमें तेजी आ रही है, उसने सरकारों और बाजारों की चिंता बढ़ा दी है।
आखिर क्यों बढ़ रही हैं खाने-पीने की कीमतें?
वैश्विक खाद्य महंगाई के पीछे कई कारण हैं, लेकिन मौजूदा हालात में अंतरराष्ट्रीय तनाव और बदलता मौसम सबसे बड़ी वजहों में शामिल हैं।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ रहा है। खाड़ी क्षेत्र और काला सागर जैसे महत्वपूर्ण इलाकों में तनाव बढ़ने से सामान की आवाजाही और सप्लाई रूट प्रभावित हो सकते हैं।
इसका असर सिर्फ खाद्य पदार्थों पर नहीं पड़ता। ईंधन, ट्रांसपोर्टेशन और खाद जैसी चीजों की लागत बढ़ने पर किसानों से लेकर सप्लायर और रिटेलर तक पूरी सप्लाई चेन महंगी हो जाती है। आखिरकार इसका बोझ उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है।
मौसम का बदलता मिजाज भी बड़ी चुनौती
दूसरी बड़ी समस्या जलवायु और मौसम से जुड़ी है। दुनिया के कई कृषि क्षेत्रों में तेज गर्मी, हीटवेव, अनियमित बारिश और अन्य प्राकृतिक घटनाओं ने फसलों की पैदावार को प्रभावित किया है।
अगर उत्पादन कम होता है और बाजार में मांग बनी रहती है, तो कीमतों पर ऊपर की तरफ दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। गेहूं और चावल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों के मामले में यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाती है।
किन खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी?
वैश्विक बाजार में कई प्रमुख खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अनाज की कीमतों में करीब 3.4% की तेजी देखने को मिली, जबकि गेहूं की कीमत लगभग 5.8% तक बढ़ी। वनस्पति तेल की कीमतों में करीब 2% की बढ़ोतरी हुई। बायोडीजल की मांग और उत्पादन से जुड़ी चुनौतियां इसके पीछे अहम कारणों में शामिल हैं। गन्ने की फसल पर मौसम के असर के चलते चीनी की कीमतों में करीब 5.6% की तेजी दर्ज की गई।
महंगी होगी आम आदमी की थाली!
अगर वैश्विक स्तर पर खाद्य कीमतों में तेजी लंबे समय तक जारी रहती है, तो इसका असर अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीके से दिखाई दे सकता है।
जिन देशों की खाद्य जरूरतों का एक हिस्सा आयात पर निर्भर है, वहां अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू बाजार तक जल्दी पहुंच सकता है। इसके अलावा महंगा ईंधन और ट्रांसपोर्टेशन भी खाद्य वस्तुओं की अंतिम कीमत बढ़ा सकता है।
इसका मतलब है कि आने वाले समय में आटा, तेल, चीनी और दूसरे जरूरी सामानों के लिए लोगों को अपनी जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ सकती है।
2022 का रिकॉर्ड अभी दूर, लेकिन चिंता बढ़ी
वैश्विक खाद्य कीमतें भले ही 2022 के ऐतिहासिक स्तर से नीचे हों, लेकिन लगातार बढ़ती कीमतों की रफ्तार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव अगर लंबे समय तक बने रहते हैं और मौसम से जुड़ी चुनौतियां बढ़ती हैं, तो खाद्य उत्पादन और सप्लाई दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ महंगाई को नियंत्रित करना नहीं होगी, बल्कि सस्ती और पर्याप्त खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करना भी होगी।
एक्सपर्ट्स का कहना है की ग्लोबल फूड इंफ्लेशन का असर सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजारों के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। गेहूं, तेल और चीनी जैसी रोजमर्रा की चीजों की कीमतें बढ़ने का सीधा असर परिवारों के मासिक बजट पर पड़ सकता है। इसलिए आने वाले समय में खाद्य कीमतों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।