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नवाबों की तहज़ीब से फैशन तक, सुई-धागे में बुनी शहर की पहचान ! जानिए लखनवी चिकनकारी की खूबसूरत विरासत

नवाबों का शहर कहें या तहज़ीब की मिसाल, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की पहचान ही कुछ अलग है। इमामबाड़ों की शान, नज़ाकत से भरी अदाएं और अदब से सजी ज़बान के साथ-साथ एक और चीज़ है जो लखनऊ को दुनिया भर में खास बनाती है। लिबास में सजी खूबसूरती, लखनवी चिकनकारीयह सिर्फ कपड़ों पर की जाने वाली कढ़ाई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी एक ऐसी कला है, जिसमें लखनऊ की रूह बसती है। लखनवी चिकनकारी की शुरुआत मुग़ल दौर से मानी जाती है। कहा जाता है कि मुग़ल बादशाह जहांगीर की पत्नी नूरजहां के दौर में ये कला यह कला ईरान से सफर तय कर हिंदुस्तान पहुंची है। वक्त के साथ यह कला लखनऊ की गलियों में रच-बस गई और आज यह शहर-ए-नवाब की पहचान बन चुकी है।

मशीन नहीं, सुई-धागे का जादू

चिकनकारी पूरी तरह हाथों से की जाने वाली कारीगरी है। महीन सुई और कच्चे सूत के धागों से कपड़े पर ऐसे नाज़ुक डिज़ाइन बनाए जाते हैं, जो किसी पेंटिंग से कम नहीं लगते। इस कढ़ाई में करीब 40 तरह के टांके और जालियां इस्तेमाल होती हैं, जैसे मुर्री, फंदा, कांटा, तेपची, पंखड़ी, बखिया और बुलबुल चश्म जाली। इनमें मुर्री को सबसे मुश्किल और कीमती टांका माना जाता है।

पीढ़ियों से जुड़ा हुनर

इस कढ़ाई से जुड़े लोगो का कहना है की पहले कपड़े पर डिज़ाइन बनाया जाता है, फिर कई कारीगर अलग-अलग चरणों में उस पर काम करते हैं। एक चिकनकारी कपड़ा कई हाथों से गुजरता है, तभी जाकर वह तैयार होता है। यही वजह है कि कीमत कढ़ाई की मेहनत भरे सफर को दर्शाती है।

फैशन और बाज़ार में बढ़ती मांग

आज लखनवी चिकनकारी सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि फैशन का अहम हिस्सा बन चुकी है। खासकर चिकनकारी कुर्तियों की मांग सबसे ज्यादा है। गर्मियों में हल्के कपड़ों जैसे जॉर्जेट, सूती, रेशम और चंदेरी सिल्कपर की गई चिकनकारी लोगों की पहली पसंद बनती जा रही है। बॉलीवुड सितारे भी शादियों और पार्टियों में चिकनकारी पहनते नजर आते हैं।

महिलाओं के हुनर की पहचान

चिकनकारी के काम में करीब 95 फीसदी महिलाएं जुड़ी हुई हैं। पुराने लखनऊ की गलियों में बैठी ये महिलाएं अपनी मेहनत से इस कला को जिंदा रखे हुए हैं। आज यह कारोबार हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

चौक और अमीनाबाद की रौनक

लखनऊ आने वाला शायद ही कोई पर्यटक होगा, जो चौक या अमीनाबाद से चिकनकारी खरीदे बिना लौट जाए। यहां दुकानों की कतारें, अलग-अलग डिज़ाइन और विदेशी पर्यटकों की भीड़ इस बात की गवाही देती है कि लखनवी चिकनकारी सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि लखनऊ की शान, विरासत और पहचान है।

Afifa Malik

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