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मादुरो की गिरफ्तारी से नेहरू तक: जब भारत ने दुनिया को सिखाया ‘सीक्रेट रेस्क्यू ऑपरेशन’ का सबक

अमेरिका ने हाल ही में एक बड़े ऑपरेशन के बाद वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तारी के बाद दोनों को अमेरिका लाया गया, जहां उनके हाथों में हथकड़ियां थीं और चारों ओर अमेरिकी सेना के अधिकारी मौजूद थे। अमेरिका पहुंचने पर मादुरो लंगड़ाते हुए नजर आए।

इस कार्रवाई को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी आलोचना हो रही है। अमेरिका ने मादुरो पर ड्रग कार्टेल चलाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि ट्रंप प्रशासन अपने कदम को सही ठहरा रहा है और दावा कर रहा है कि किसी अन्य देश ने इस तरह का कोई ऑपरेशन नहीं किया है।

लेकिन यह दावा पूरी तरह सही नहीं है। भारत इससे पहले दो मौकों पर ऐसे ही ऑपरेशन कर चुका है। भारत ने इंडोनेशिया और नेपाल में विशेष ऑपरेशन चलाकर वहां फंसे अपने नागरिकों या प्रमुख व्यक्तियों को उनकी सहमति से सुरक्षित रेस्क्यू कर देश वापस लाया था। यह तथ्य कई लोगों के लिए चौंकाने वाला हो सकता है, लेकिन यह पूरी तरह सच है।

बात साल 1946 की है, जब ब्रिटिश हुकूमत ने भारत को आज़ाद करने की घोषणा की थी। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू अंतरिम सरकार के मुखिया थे। नेहरू उपनिवेशवाद के घोर विरोधी थे और इस मुद्दे पर लगातार लिखते-बोलते रहे। उनके निशाने पर ब्रिटेन, फ्रांस, डच और पुर्तगाल जैसे देश थे, जिन्हें वह औपनिवेशिक शासन खत्म करने की सलाह देते रहे।

इसी दौर में, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने इंडोनेशिया पर कब्जा कर लिया था। हालांकि, 1945 में हालात पूरी तरह बदल गए। जापान के आत्मसमर्पण के बाद सुकर्णो और मोहम्मद हत्ता ने इंडोनेशिया की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। सुकर्णो देश के राष्ट्रपति बने, जबकि सुतान शारिर पहले प्रधानमंत्री नियुक्त हुए।

लेकिन नीदरलैंड्स (डच) अपनी पुरानी कॉलोनी इंडोनेशिया को वापस हासिल करना चाहता था। बातचीत नाकाम रहने के बाद डच औपनिवेशिक शासन ने ऑपरेशन प्रोडक्ट शुरू किया। इसके तहत डच सेना ने राजधानी जकार्ता समेत कई प्रमुख शहरों पर कब्जा कर लिया। प्रधानमंत्री सुतान शारिर को नजरबंद कर दिया गया, जबकि उपराष्ट्रपति मोहम्मद हत्ता और अन्य नेता जंगलों में छिपने को मजबूर हो गए।

इसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दोनों इंडोनेशियाई नेताओं को रेस्क्यू करने का फैसला किया। इस साहसिक मिशन को सफल बनाने के लिए नेहरू ने ओडिशा के अनुभवी पायलट बीजू पटनायक को चुना। गौरतलब है कि बीजू पटनायक आगे चलकर ओडिशा के मुख्यमंत्री बने।

उस समय हालात इसलिए बेहद खतरनाक थे, क्योंकि डच प्रशासन ने सख्त चेतावनी जारी कर रखी थी। इसके बावजूद बीजू पटनायक ने डच निगरानी को चकमा दिया और दोनों नेताओं को सुरक्षित निकाल लिया। दोनों इंडोनेशियाई नेता 22 जुलाई को सिंगापुर और 24 जुलाई को दिल्ली पहुंचे।

इस दौरान डच फाइटर विमानों ने विमान पर हमला करने की कोशिश भी की, लेकिन बीजू पटनायक साहस और कुशलता के साथ मिशन को सफल बनाते हुए सुरक्षित बच निकले।भारत की आज़ादी के बाद नेपाल में सत्ता का संघर्ष तेज हो गया था। 1950 में नेपाल के राजा त्रिभुवन शाह नाममात्र के शासक थे, जबकि असली ताकत राणा परिवार के हाथों में थी, जिसे ब्रिटिश समर्थन भी हासिल था। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने यह चुनौती थी कि नेपाल में लोकतांत्रिक ताकतों का साथ कैसे दिया जाए।

नवंबर 1950 में राजा त्रिभुवन अपने परिवार के साथ भारतीय दूतावास में शरण लेने पहुंचे। इसके जवाब में राणा शासन ने उनके पोते ज्ञानेंद्र को राजा घोषित कर दिया। इसके बाद भारत ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राजा त्रिभुवन और उनके परिवार को एयरलिफ्ट कर दिल्ली लाया। नेहरू ने ज्ञानेंद्र को वैध राजा मानने से इनकार किया और राणा शासन पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा दिया।

SYED MOHAMMAD ABBAS

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