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NASA वैज्ञानिक का ‘मौत’ से तीन बार साक्षात्कार: क्या मृत्यु सिर्फ एक भ्रम है? इंग्रिड होनकाला के दावों ने विज्ञान को दी चुनौती

वॉशिंगटन/बोगोटा। क्या मौत वाकई जीवन की ‘पूर्णविराम’ है, या फिर यह किसी अनंत यात्रा का केवल एक ‘अल्पविराम’? नासा (NASA) की पूर्व वैज्ञानिक और मरीन साइंस में पीएचडी इंग्रिड होनकाला के दावों ने इस सदियों पुरानी बहस में विज्ञान और आध्यात्मिकता को एक साथ खड़ा कर दिया है। तीन बार मौत के करीब जाकर वापस लौटने वाली इंग्रिड का कहना है कि जिसे हम ‘अंत’ समझते हैं, वह असल में चेतना (Consciousness) का नया विस्तार है।

1. शरीर से परे ‘सुपर-कॉन्शियसनेस’ का अनुभव

इंग्रिड की कहानी महज एक दुर्घटना की दास्तां नहीं है। 2 साल की उम्र में पानी के टैंक में डूबने के दौरान उन्होंने ‘आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियंस’ का दावा किया।

  • अनोखा दावा: इंग्रिड ने बताया कि जब उनका शरीर बर्फीले पानी में बेजान हो रहा था, तब उनकी चेतना दूर ऑफिस जा रही अपनी मां को देख रही थी।
  • टेलीपैथी का संकेत: उन्होंने मन ही मन अपनी मां को पुकारा, और आश्चर्यजनक रूप से उनकी मां को अनहोनी का आभास हुआ। विज्ञान इसे ‘संयोग’ कह सकता है, लेकिन इंग्रिड इसे चेतना की शक्ति मानती हैं।

2. समय और आकार का अंत: प्रकाश की दुनिया

अपनी आगामी किताब ‘Dying to See the Light’ में इंग्रिड ने मृत्यु के बाद की दुनिया का जो विवरण दिया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है:

  • प्रकाश पुंज: वहां वह कोई हाड़-मांस का शरीर नहीं, बल्कि ‘प्रकाश की किरण’ थीं।
  • समय का अभाव: उस आयाम में समय जैसी कोई चीज़ मौजूद नहीं थी।
  • यूनिवर्सल कनेक्शन: उन्हें अहसास हुआ कि पूरा ब्रह्मांड एक अदृश्य धागे से जुड़ा हुआ है। इंग्रिड के अनुसार, वहां का अनुभव किसी डरावनी फिल्म जैसा नहीं, बल्कि असीम शांति वाला था।

3. वैज्ञानिक तर्क बनाम आध्यात्मिक अनुभव

इंग्रिड ने 25 साल की उम्र में बाइक हादसे और 52 की उम्र में सर्जरी के दौरान भी इसी स्थिति का सामना किया।

विज्ञान का पक्ष: अक्सर आलोचक इसे ‘सेरेब्रल हाइपोक्सिया’ (ऑक्सीजन की कमी से दिमाग में होने वाला भ्रम) कहते हैं।

इंग्रिड का तर्क: एक वैज्ञानिक के तौर पर इंग्रिड का मानना है कि हमारी चेतना केवल दिमाग की उपज नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड का एक मौलिक हिस्सा है।

4. मृत्यु का भय हुआ खत्म

नासा और अमेरिकी नेवी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ काम करने वाली इंग्रिड अब 55 वर्ष की हैं और पूरी तरह ‘फियरलेस’ (निडर) हैं। उनका मानना है कि साइंस और स्पिरिचुअलिटी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनके लिए मृत्यु अंत नहीं, बल्कि चेतना का ‘फॉर्म चेंज’ (रूप परिवर्तन) है।

चेतना का नया क्षितिज

इंग्रिड होनकाला के अनुभव हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि शायद हमारी समझ का दायरा अभी बहुत छोटा है। यदि एक वैज्ञानिक का दिमाग भी मृत्यु के पार शांति और दिव्य आकृतियों को देख रहा है, तो निश्चित रूप से मानव अस्तित्व के कुछ ऐसे रहस्य हैं जिन्हें अभी डिकोड किया जाना बाकी है।

news desk

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