पूर्व नासा वैज्ञानिक इंग्रिड होनकाला Image Credit source: Facebook/@IngridHonkala
वॉशिंगटन/बोगोटा। क्या मौत वाकई जीवन की ‘पूर्णविराम’ है, या फिर यह किसी अनंत यात्रा का केवल एक ‘अल्पविराम’? नासा (NASA) की पूर्व वैज्ञानिक और मरीन साइंस में पीएचडी इंग्रिड होनकाला के दावों ने इस सदियों पुरानी बहस में विज्ञान और आध्यात्मिकता को एक साथ खड़ा कर दिया है। तीन बार मौत के करीब जाकर वापस लौटने वाली इंग्रिड का कहना है कि जिसे हम ‘अंत’ समझते हैं, वह असल में चेतना (Consciousness) का नया विस्तार है।
इंग्रिड की कहानी महज एक दुर्घटना की दास्तां नहीं है। 2 साल की उम्र में पानी के टैंक में डूबने के दौरान उन्होंने ‘आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियंस’ का दावा किया।
अपनी आगामी किताब ‘Dying to See the Light’ में इंग्रिड ने मृत्यु के बाद की दुनिया का जो विवरण दिया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है:
इंग्रिड ने 25 साल की उम्र में बाइक हादसे और 52 की उम्र में सर्जरी के दौरान भी इसी स्थिति का सामना किया।
विज्ञान का पक्ष: अक्सर आलोचक इसे ‘सेरेब्रल हाइपोक्सिया’ (ऑक्सीजन की कमी से दिमाग में होने वाला भ्रम) कहते हैं।
इंग्रिड का तर्क: एक वैज्ञानिक के तौर पर इंग्रिड का मानना है कि हमारी चेतना केवल दिमाग की उपज नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड का एक मौलिक हिस्सा है।
नासा और अमेरिकी नेवी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ काम करने वाली इंग्रिड अब 55 वर्ष की हैं और पूरी तरह ‘फियरलेस’ (निडर) हैं। उनका मानना है कि साइंस और स्पिरिचुअलिटी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनके लिए मृत्यु अंत नहीं, बल्कि चेतना का ‘फॉर्म चेंज’ (रूप परिवर्तन) है।
इंग्रिड होनकाला के अनुभव हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि शायद हमारी समझ का दायरा अभी बहुत छोटा है। यदि एक वैज्ञानिक का दिमाग भी मृत्यु के पार शांति और दिव्य आकृतियों को देख रहा है, तो निश्चित रूप से मानव अस्तित्व के कुछ ऐसे रहस्य हैं जिन्हें अभी डिकोड किया जाना बाकी है।
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