दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ कानूनी लड़ाई से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर मानवाधिकारों की पैरवी तक, नावी पिल्लई का सफर संघर्ष और न्याय की मिसाल रहा है। भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नावनेथम ‘नावी’ पिल्लई को 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। नॉर्वे की नोबेल समिति ने 9 अक्टूबर को ओस्लो में पुरस्कार की घोषणा की। पिल्लई को यह सम्मान शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने की दिशा में उनके योगदान के लिए दिया गया है।
इस वर्ष पुरस्कार के लिए 287 उम्मीदवारों और संगठनों के नामांकन थे। पिल्लई की उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने अपने करियर में उन लोगों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई, जिन्हें नस्लीय भेदभाव, राजनीतिक दमन और हिंसा का सामना करना पड़ा।
रंगभेद के दौर में शुरू हुई न्याय की लड़ाई
नावी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन स्थित क्लेयरवुड में एक तमिल मूल के भारतीय परिवार में हुआ था। उनके दादा-दादी 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे, जहां उन्होंने गन्ने के खेतों में अनुबंधित मजदूरों के रूप में काम किया।
पिल्लई ने नेटाल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद कानून को अपना पेशा बनाया। 1967 में वह नेटाल में वकालत शुरू करने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। उस समय दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति लागू थी और राजनीतिक विरोधियों को हिरासत में लेकर प्रताड़ित किए जाने की शिकायतें आम थीं।
उन्होंने रंगभेद विरोधी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं के मुकदमे लड़े और राजनीतिक कैदियों को कानूनी सहायता दी। उनके पति गैबी पिल्लई को भी सिक्योरिटी पुलिस ने हिरासत में लिया था। इन मामलों के दौरान उन्होंने पुलिस हिरासत में यातना और एकांत कारावास जैसी परिस्थितियों को करीब से देखा।
1973 में उन्होंने राजनीतिक बंदियों को अपने वकीलों से मिलने का अधिकार दिलाने की कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की। यह उनके लंबे मानवाधिकार अभियान का एक अहम पड़ाव था।
हार्वर्ड से पढ़ाई और अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका तक सफर
न्याय के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए पिल्लई ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से 1982 में मास्टर ऑफ लॉ और 1988 में डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस की डिग्री हासिल की। उन्होंने विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया और कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया।
रंगभेद की समाप्ति के बाद 1995 में उन्हें दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में कार्यवाहक जज नियुक्त किया गया। इसी वर्ष वह रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल की जज बनीं। 1999 से 2003 तक उन्होंने इस ट्रिब्यूनल की अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी निभाई।
इस दौरान उनका सबसे चर्चित योगदान जां-पॉल अकायेसु के मुकदमे से जुड़ा रहा। इस मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि कुछ परिस्थितियों में बलात्कार और यौन हिंसा भी नरसंहार के कृत्य हो सकते हैं। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून में यौन हिंसा के मामलों को देखने का नजरिया बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ICC की जज से संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार प्रमुख तक
फरवरी 2003 में नावी पिल्लई को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के शुरुआती न्यायाधीशों के पैनल में चुना गया। इसके बाद 2008 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में नई जिम्मेदारी संभालने के लिए ICC से इस्तीफा दे दिया।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 28 जुलाई 2008 को उन्हें मानवाधिकार उच्चायुक्त नियुक्त करने की मंजूरी दी। उन्होंने 1 सितंबर 2008 को पदभार ग्रहण किया और 2014 तक इस पद पर रहीं।
मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में उन्होंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानवाधिकारों के उल्लंघन, राजनीतिक दमन और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाया। श्रीलंका के गृहयुद्ध के अंतिम चरण के बाद उन्होंने कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच की मांग भी की थी।
महिला अधिकारों और समानता के लिए भी संघर्ष
नावी पिल्लई का योगदान केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहा। दक्षिण अफ्रीका में महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों से जुड़कर उन्होंने संविधान में समानता के सिद्धांत को मजबूत करने की दिशा में काम किया।
उन्होंने नस्ल, लिंग, धर्म और यौन रुझान के आधार पर भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। महिला अधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय अभियानों में उनकी भूमिका रही और उन्होंने बच्चों, कैदियों तथा यातना और घरेलू हिंसा के पीड़ितों के अधिकारों की पैरवी की।
उनके काम को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने सम्मानित किया। 2003 में उन्हें पहला ग्रुबर महिला अधिकार पुरस्कार मिला। विभिन्न विश्वविद्यालयों ने भी उन्हें मानद उपाधियों से सम्मानित किया।
नावी पिल्लई को क्यों मिला नोबेल शांति पुरस्कार?
नावी पिल्लई का करियर इस बात का उदाहरण है कि शांति केवल युद्ध रोकने तक सीमित नहीं है। न्याय तक पहुंच, मानवाधिकारों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रभावी इस्तेमाल भी स्थायी शांति के लिए जरूरी हैं।
रंगभेद के दौर में राजनीतिक कार्यकर्ताओं का बचाव करने से लेकर रवांडा में यौन हिंसा पर ऐतिहासिक न्यायिक फैसले और संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों की पैरवी तक, उन्होंने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।
2026 का नोबेल शांति पुरस्कार उनके इसी लंबे योगदान को वैश्विक पहचान देता है। उनका सफर बताता है कि अदालत में लड़ी गई कानूनी लड़ाई भी समाज में समानता स्थापित करने और दुनिया को अधिक न्यायपूर्ण बनाने का माध्यम बन सकती है।