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प्रेम-पत्रों और डायरियों से भरा बक्सा, शादी पर पति की प्रेमिका का हंगामा…क्यों हमेशा चर्चा में रहा प्रख्यात लेखिका मन्नू भण्डारी का विवाह ?

विवाह ! हर स्त्री न जाने कितने सपने, कितनी आकांक्षाएं लेकर इस नए जीवन में प्रवेश करती है. खुशियों से भरी उम्मीदें, भविष्य की योजनाएं और जीवन साथी के साथ साझा होने वाले पल—सब कुछ उसके मन में रंग भरते हैं. पर हिंदी की जानी-मानी लेखिका मन्नू भण्डारी का प्रेम-विवाह उनके जीवन की कितनी बड़ी त्रासदी बना इसकी कल्पना भी आप नहीं कर सकते. मन्नू भण्डारी अपनी आत्मकथा ‘ एक कहानी यह भी ‘ में अपने पति और स्त्री-विमर्श के पुरोधा रहे राजेंद्र यादव से जुड़े ऐसे कई चौंकाने वाले खुलासे करती हैं.

जब घरवालों के सामने राजेंद्र यादव ने किया था मन्नू भण्डारी को प्रपोज़

हमने पिछला सबकुछ भुला कर मन की ‘खाली स्लेट’ के साथ अपने जीवन की शुरुआत की थी. राजेंद्र यादव के साथ प्रेम-संबंध पर मन्नू भण्डारी यही कहती हैं. इसके साथ ही उनकी मोहब्बत इस कदर परवान चढ़ी थी कि कुछ ही समय में राजेंद्र यादव ने मन्नू भण्डारी के घरवालों के सामने उनका हाथ पकड़कर कह डाला था कि ‘रस्म-रिवाज़ में तो मेरा बहुत ज़्यादा विश्वास नहीं, पर वी आर मैरिड !’

देखने में तो लेखक-लेखिका की यह जोड़ी परफैक्ट थी, लेकिन कुछ ही समय बाद, यह विवाह मन्नू जी के लिए उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी में बदल गई.

दरअसल मन्नू भण्डारी को यह पता ही नहीं था कि शादी से पहले राजेंद्र ने जिस महिला ( जिसे राजेंद्र ‘मीता’ नाम से बुलाते थे ) के साथ अपने प्रेम-संबंध को अतीत बताया था, वह अभी भी उनके साथ रिलेशन में थी. इसके बाद राजेन्द्र के इस लव-ट्रायंगल ने मन्नू जी के वैवाहिक जीवन को नर्क बना दिया था. इस तरह जिस चमकदार शुरुआत ने सबका दिल जीत लिया था, वही कुछ समय में दर्द और झूठ के साये में दब गई थी.

एक तरफ प्रेमिका के आंसू दूसरी तरफ शादी की रस्में, कितने तूफानों में घिरे बैठे रहे राजेंद्र यादव

अपने विवाह के पहले दिन का जिक्र करते हुए मन्नू जी लिखती हैं कि 22 नवम्बर को शादी के बाद जब वे राजेन्द्र यादव के साथ आगरा में ससुराल पहुंचती हैं तो यह उनके लिए एक नए जीवन की दहलीज़ पर कदम रखने जैसा अहसास था.

दरवाज़े पर आरती और द्वार-रुकाई की रस्म ने मानो स्वागत की खुशी को और गाढ़ा कर दिया था. घर के आंगन में बाई, बहनें और औरतों का जमावड़ा था और रस्मों की चहल-पहल भी थी. वे बताती हैं कि मैं घर के आंगन में पटरे पर बैठीं शादी की रस्में कर रहीं थीं, और जिस स्थिति की मैं दूर-दूर तक कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकती थी, उस स्थिति से गुज़रते हुए राजेन्द्र मेरे पास बैठे थे… मीता की मित्र का कमरा…लगातार रोती हुई मीता और झूठ, छल, प्रपंच के आरोपों की बौछार करती, धिक्कार-भरी शब्दावली में फटकारती मीता की मित्र… राजेन्द्र सब सुनते हुए भी जैसे पत्थर की तरह मौन बैठे रहे थे.

वे आगे बताती हैं कि मन में न जाने कितने तूफानों की हलचल झेलते हुए भी निश्चल, निस्पन्द बैठे राजेन्द्र आखिर कुछ देर बाद मेरे पास से उठकर जाते हैं और खुद ही हिम्मत करके मीता के आंसू पोंछते हैं. न सिर्फ राजेन्द्र जी मीता के उसके आंसू पोंछते हैं बल्कि उसका हाथ पकड़कर उम्मीद और आश्वासन देते हुए कहते हैं कि “शादी मैंने जरूर मन्नू से कर ली है, पर हमारा-तुम्हारा संबंध तो जैसा है, वैसा ही रहेगा. शादी में वैसे भी मेरा कोई विश्वास नहीं… सो यह बन्धन मेरे तुम्हारे बीच कभी बाधा नहीं बन सकेगा.”
मन्नू यह सुनकर चौंक उठती हैं पर फिर स्थिति की संवेदनशीलता समझते हुए वे चुपचाप बैठी रहती हैं.

वे कहती हैं कि जब रात को राजेन्द्र उनके पास आए तो उनकी रगों में लहू नहीं, अपने किए का अपराध-बोध, मीता के आंसू और उसकी मित्र की धिक्कार-भरी फटकारें बह रही थीं… बिलकुल ठंडे और निरुत्साहित. और फिर यह ठंडापन हमेशा के लिए उनके सम्बन्धों के बीच जैसे स्थायी भाव बनकर जम गया था…

राजेंद्र यादव और मन्नू भण्डारी

जब मन्नू भण्डारी के हाथ लगी राजेंद्र यादव के प्रेम-पत्रों से भरे बक्से की चाभी

एक दिन राजेन्द्र यादव कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहे थे और इसी वक्त पलंग के नीचे रखे उनके एक ‘खास’ बक्से की चाभी किसी तरह मन्नू भण्डारी के हाथ लग गई. उन्होंने चुपचाप बक्से का ताला खोलकर चाभी को अपनी जगह सरकाकर रख दिया और राजेंद्र के जाने के बाद बक्से को खोला. वे कहती हैं ‘पत्रों और डायरियों से भरा वह बक्सा मेरे सामने खुला पड़ा था…सारी घटनाओं, स्थितियों, संवादों और मानसिक दशाओं के विस्तृत ब्योरों से भरी वह डायरी मेरे हाथ में थी. बहते आंसुओं के बीच मैं उसे पढ़े जा रही थी और लग रहा था जैसे मेरे पांव के नीचे की जमीन ही सरकती जा रही है.’
वे बताती हैं कि राजेंद्र की इस समानान्तर जिन्दगी ने हमारी छतें तो पहले ही अलग कर दी थी, अब जमीन भी खींच ली…‘इतना बड़ा धोखा…ऐसा छल..अब इस सम्बन्धहीन सम्बन्ध को लेकर कहां खड़ी रहूंगी. कैसे खड़ी रहूंगी ?’

क्यों वर्षों तक राजेंद्र यादव को नहीं छोड़ पाईं मन्नू भण्डारी ?

मन्नू जी अपनी आत्मकथा में बताती हैं कि जब भी उन्होंने इस संबंध से निकलने का फैसला लिया, हमेशा राजेंद्र ने उन्हें रोक लिया. इस घटना के बाद जब उन्होंने राजेन्द्र से अपने साथ हुए इस धोखे की बात की तब राजेद्र ने रोते हुए कहा था कि ‘ मन्नू, यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा ब्लैक स्पॉट है. तुम्हीं मुझे इससे उबार सकती हो. देखो, तुम मुझे छोड़कर मत जाना. तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी…’ वे कहती हैं कि दयनीयता में लिपटे , अन्तरात्मा से निकले राजेंद्र के इस आग्रह में न झूठ की गन्ध थी, न छल का आभास आता था. उन्होंने जब भी इस रिश्ते को तोड़ने की बात सोची राजेंद्र के आंसू, उनकी कातरता मन्नू भण्डारी के सारे संकल्प को बहा देते थे.
लेखकों का निजी जीवन अक्सर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व जितना ही जटिल और विवादस्पद रहा है. निजी संबंध, प्रेम-प्रसंग, आर्थिक संघर्ष और मानसिक उलझनें अक्सर उनकी पर्सनल लाईफ को अंधेरे में डुबा देती हैं. हालांकि मन्नू भण्डारी और राजेंद्र यादव की निजी जिंदगी साहित्य-विमर्श में खासा चर्चा का विषय रही.

news desk

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