नई दिल्ली। देश में चुनावी शोर थमते ही आम आदमी की जेब पर महंगाई का दोहरा वार हुआ है। शुक्रवार सुबह से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर के भारी इजाफे ने जनता को चौंका दिया है। इस फैसले के समय को लेकर विपक्ष ने सरकार की घेराबंदी शुरू कर दी है, क्योंकि यह बढ़ोतरी प्रधानमंत्री मोदी के 5 दिवसीय विदेश दौरे पर रवाना होते ही की गई है।
1. “काश! चुनाव चल रहे होते” – विपक्ष का तीखा तंज
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इस उछाल को विपक्ष ने ‘चुनावी राहत’ के अंत के रूप में देखा है।
- इमरान प्रतापगढ़ी (कांग्रेस): उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पीएम मोदी के विदेश जाते ही देश को महंगाई का ‘तोहफा’ मिला है। प्रतापगढ़ी ने कटाक्ष किया, “काश चुनाव अभी चल रहे होते, तो पेट्रोल-डीजल महंगा न होता।”
डेरेक ओ’ब्रायन (TMC): टीएमसी सांसद ने इसे एक सोची-समझी रणनीति बताते हुए कहा कि पहले वोट लूटे गए और अब वहीं चोट दी जा रही है जहाँ सबसे ज्यादा दर्द होता है। - प्रियंका चतुर्वेदी (शिवसेना UBT): उन्होंने गिरते रुपये और बढ़ते दामों को रेस बताते हुए पूछा कि पेट्रोल, डीजल और रुपया… इनमें से ‘सेंचुरी’ सबसे पहले कौन लगाएगा?
2. “साइकिल ही विकल्प है” – अखिलेश यादव का संदेश
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस महंगाई को पर्यावरण और अर्थव्यवस्था से जोड़ते हुए जनता को एक पुराना सुझाव नए अंदाज में दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि अगर अब आगे बढ़ना है, तो ‘साइकिल’ ही एकमात्र विकल्प बचा है।
3. केवल ईंधन ही नहीं, दूध भी हुआ महंगा
महंगाई का यह हंटर सिर्फ वाहनों पर ही नहीं, बल्कि रसोई पर भी चला है। पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ आम जनता को निम्नलिखित झटके भी लगे हैं:
- दूध: अमूल और मदर डेयरी ने दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है।
- CNG: सीएनजी के दामों में भी 2 रुपये का इजाफा किया गया है।
कांग्रेस का आधिकारिक बयान: “चुनाव खत्म और वसूली शुरू। पीएम मोदी ने जनता पर फिर से महंगाई का हंटर चलाया है।”
आर्थिक विश्लेषण: घर के बजट पर ‘ट्रिपल’ अटैक
विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर माल ढुलाई पर पड़ता है, जिससे आने वाले दिनों में फल, सब्जियां और अन्य जरूरी सामान भी महंगे हो सकते हैं। एक तरफ दूध (डेयरी), दूसरी तरफ ईंधन (पेट्रोल-डीजल) और तीसरी तरफ ट्रांसपोर्ट (CNG) के दाम बढ़ने से मध्यम वर्गीय परिवारों का बजट पूरी तरह चरमरा गया है।
अब सवाल यह है कि क्या राज्य सरकारें VAT कम कर जनता को राहत देंगी, या यह महंगाई की आग अभी और भड़केगी?


