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बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त होंगे दिनेश त्रिवेदी, कूटनीति के साथ बंगाल के ‘चुनावी गणित’ पर भी निशाना

नई दिल्ली/ढाका: भारत सरकार ने पड़ोसी देश बांग्लादेश के साथ रिश्तों को एक नई ऊंचाई और दिशा देने के लिए एक बड़ा दांव खेला है। पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में भारत का नया उच्चायुक्त (High Commissioner) नियुक्त किया गया है।

यह नियुक्ति न केवल कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी इसके गहरे मायने निकाले जा रहे हैं।

प्रणय वर्मा की जगह संभालेंगे कमान

दिनेश त्रिवेदी वर्तमान उच्चायुक्त प्रणय वर्मा का स्थान लेंगे। कूटनीतिक फेरबदल के तहत प्रणय वर्मा को ब्रसेल्स भेजा जा रहा है, जहाँ वे यूरोपीय संघ (EU) में भारत के राजदूत की जिम्मेदारी संभालेंगे। त्रिवेदी की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद रिश्तों में एक नया मोड़ आया है।

क्यों अहम है दिनेश त्रिवेदी का चयन? (3 प्रमुख कारण)

  1. बंगाल चुनाव और रणनीतिक दांव:
    पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले त्रिवेदी की यह नियुक्ति भाजपा का एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। बैरकपुर से पूर्व सांसद रहे त्रिवेदी की बंगाल की ज़मीनी राजनीति और शरणार्थी/सीमा मुद्दों पर गहरी समझ है। बांग्लादेश में उनकी उपस्थिति सीमा पार के समीकरणों और बंगाल के वोटर्स के बीच एक बड़ा संदेश दे सकती है।
  2. कूटनीति में ‘पॉलिटिकल वेट’ का इस्तेमाल:
    आमतौर पर विदेशी मिशनों में आईएफएस (IFS) अधिकारियों की नियुक्ति होती है, लेकिन दिनेश त्रिवेदी जैसे अनुभवी राजनेता को ढाका भेजना यह दर्शाता है कि भारत बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को ‘हाइ-प्रोफाइल’ प्राथमिकता दे रहा है। त्रिवेदी का लंबा प्रशासनिक अनुभव और दिल्ली की सत्ता में उनकी पकड़ जटिल मुद्दों को सुलझाने में सहायक हो सकती है।
  3. अस्थिरता के बीच रिश्तों को संतुलित करना:
    शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा और हालिया राजनीतिक बदलावों (तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद) के बीच भारत को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो कड़क और मिलनसार दोनों हो सके। त्रिवेदी इस खांचे में पूरी तरह फिट बैठते हैं।

विवादों से लेकर कूटनीति तक का सफर

रेल बजट का वो किस्सा: दिनेश त्रिवेदी को आज भी 2012 के उस साहसी रेल बजट के लिए याद किया जाता है, जिसमें यात्री किराया बढ़ाने के कारण उन्हें ममता बनर्जी के विरोध का सामना करना पड़ा और इस्तीफा देना पड़ा था।

अनुभव का खजाना: 1990 से राजनीति में सक्रिय त्रिवेदी राज्यसभा और लोकसभा दोनों सदनों के सदस्य रह चुके हैं। 2021 में टीएमसी छोड़ भाजपा में शामिल होने के बाद से वे पार्टी के रणनीतिक कार्यों में सक्रिय रहे हैं।

news desk

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