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INDIA गठबंधन में बढ़ी दरार? संसद में विपक्ष से अलग बैठेगी DMK, क्या बदल रही है तमिलनाडु की राजनीति की दिशा?

नई दिल्ली: विपक्षी राजनीति के केंद्र में एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कांग्रेस के प्रमुख सहयोगी दलों में शामिल डीएमके ने न सिर्फ 8 जून को होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक से दूरी बनाई है, बल्कि संसद में भी विपक्षी दलों के साथ बैठने से अलग रहने का फैसला किया है। इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरणों की चर्चाओं को तेज कर दिया है।

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक हालातों के बीच डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में आई खटास अब खुलकर सामने आती दिख रही है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या डीएमके भविष्य में कोई नया राजनीतिक रास्ता चुन सकती है।

कांग्रेस-टीवीके नजदीकी से बढ़ी नाराजगी

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि तमिलनाडु चुनाव के बाद कांग्रेस ने अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके के साथ राजनीतिक नजदीकियां बढ़ाईं। बताया जा रहा है कि इसी कदम से डीएमके नेतृत्व नाराज हो गया।

सूत्रों के मुताबिक, सीट बंटवारे को लेकर भी दोनों दलों के बीच मतभेद रहे। चुनाव के दौरान कांग्रेस को 28 सीटें और एक राज्यसभा सीट देने का आश्वासन मिला था, लेकिन इसके बावजूद रिश्तों में तनाव बना रहा। चुनाव प्रचार के दौरान भी कांग्रेस नेतृत्व और डीएमके के शीर्ष नेताओं के बीच अपेक्षित राजनीतिक तालमेल दिखाई नहीं दिया।

संसद में विपक्ष से अलग बैठेगी डीएमके

कांग्रेस से बढ़ती दूरी का सबसे बड़ा संकेत संसद में देखने को मिला है। डीएमके ने लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर विपक्षी दलों से अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की थी, जिसे मंजूरी मिल चुकी है।

लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद और राज्यसभा में 8 सांसद हैं। संख्या के लिहाज से यह कांग्रेस के सबसे बड़े सहयोगी दलों में शामिल रही है। इसके बावजूद अब पार्टी ने विपक्षी खेमे से अलग पहचान बनाने का संकेत दिया है।

इंडिया गठबंधन की बैठक में नहीं होगी मौजूदगी

8 जून को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की बैठक में कई प्रमुख विपक्षी नेता शामिल होने वाले हैं। पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के भी दिल्ली पहुंचने की चर्चा है।

हालांकि इस बैठक में डीएमके की अनुपस्थिति सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक बैठक से दूरी नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश भी हो सकता है।

क्या फिर करीब आ सकते हैं डीएमके और बीजेपी?

डीएमके का राजनीतिक इतिहास बताता है कि पार्टी अतीत में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रह चुकी है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में डीएमके के नेता मंत्री भी रहे थे।

इसी वजह से अब यह अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या डीएमके भविष्य में फिर किसी नए राष्ट्रीय समीकरण की ओर बढ़ सकती है। हालांकि पार्टी की ओर से अब तक ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है कि वह एनडीए में शामिल होने जा रही है।

परिसीमन जैसे मुद्दों पर बदलते संकेत

रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार द्वारा लाए जाने वाले संभावित परिसीमन विधेयक जैसे मुद्दों पर डीएमके का रुख चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीतिक गलियारों में इसे कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके फिलहाल खुद को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर उसकी सौदेबाजी की क्षमता मजबूत बनी रहे।

बैठक की सबसे बड़ी चर्चा बनेगी डीएमके की गैरमौजूदगी

इंडिया गठबंधन की आगामी बैठक में जहां कई विपक्षी नेताओं की मौजूदगी अहम होगी, वहीं डीएमके की अनुपस्थिति उससे भी बड़ी राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकती है। आने वाले दिनों में पार्टी का अगला कदम राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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