नई दिल्ली: दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली के बाद देश की चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव को फर्जी बताते हुए पिछले दो वर्षों में कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इन चुनावों में गड़बड़ी हुई है और कुछ राज्यों में चुनाव रद्द कराकर दोबारा मतदान कराया जाना चाहिए।
विपक्ष की इस मांग में पश्चिम बंगाल, बिहार, दिल्ली, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के चुनावों का जिक्र किया जा रहा है। विपक्ष केवल चुनाव रद्द कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने, एसआईआर और ईवीएम की प्रक्रिया पर सवाल उठाने के साथ बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी कर रहा है।
इससे पहले विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन सौंपकर पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग उठाई थी। अब रामलीला मैदान की रैली में राहुल गांधी के बयान के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि क्या किसी राजनीतिक दल की मांग पर पुराने चुनाव रद्द किए जा सकते हैं? अगर चुनाव में गड़बड़ी हुई है तो उसे साबित करने और दोबारा मतदान कराने का कानूनी रास्ता क्या है?
चुनाव रद्द करने को लेकर कानून क्या कहता है?
भारत में चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में कई प्रावधान किए गए हैं। चुनाव में धांधली, फर्जी मतदान, बूथ कैप्चरिंग या मतगणना में गंभीर अनियमितता जैसी शिकायतें सामने आने पर चुनाव को चुनौती दी जा सकती है। लेकिन केवल आरोप लगाने या राजनीतिक विरोध जताने से किसी चुनाव को रद्द नहीं किया जा सकता।
इसके लिए कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना होता है। शिकायत करने वाले पक्ष को यह भी बताना पड़ता है कि चुनाव में किस तरह की गड़बड़ी हुई और उसका चुनाव परिणाम पर क्या असर पड़ा। चुनाव रद्द करने का फैसला संबंधित कानूनी प्राधिकारी ही कर सकता है।
संविधान का अनुच्छेद 329(B) क्या कहता है?
संविधान के अनुच्छेद 329(बी) के तहत संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनाव को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका का रास्ता निर्धारित किया गया है। इसके मुताबिक किसी चुनाव को अदालत में चुनौती केवल कानून में तय प्रक्रिया के तहत ही दी जा सकती है।
इस प्रावधान का उद्देश्य यह है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान अलग-अलग याचिकाओं के जरिए मतदान और चुनावी व्यवस्था को बार-बार बाधित न किया जाए। यानी चुनाव को चुनौती देने के लिए एक निर्धारित कानूनी रास्ता अपनाना जरूरी है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 80: चुनाव को चुनौती देने का आधार
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 के अनुसार किसी चुनाव को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका दाखिल करनी होती है। अगर किसी उम्मीदवार को लगता है कि उसके निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव निष्पक्ष तरीके से नहीं हुआ या परिणाम में कानूनी अनियमितता हुई है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
हालांकि, केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि चुनाव में गड़बड़ी हुई। याचिका में अनियमितता के आधार और उससे जुड़े तथ्यों को स्पष्ट करना जरूरी होता है।
धारा 81: कौन दाखिल कर सकता है चुनाव याचिका?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 81 चुनाव याचिका दाखिल करने के अधिकार और उसकी समयसीमा से जुड़ी है। इसके तहत चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार या संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए याचिका दाखिल कर सकता है।
यानी किसी राजनीतिक दल की ओर से सामान्य आरोप लगाने भर से चुनाव रद्द कराने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो जाती। इसके लिए कानून में निर्धारित पात्रता और समयसीमा का पालन करना पड़ता है।
धारा 100: किन परिस्थितियों में चुनाव हो सकता है रद्द?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 100 में उन परिस्थितियों का उल्लेख है, जिनमें हाईकोर्ट किसी निर्वाचित उम्मीदवार के चुनाव को अमान्य घोषित कर सकता है।
अगर चुनाव याचिका में लगाए गए आरोप कानून के तहत साबित हो जाते हैं और अदालत को चुनाव में ऐसी अनियमितता मिलती है जो निर्धारित कानूनी आधारों के दायरे में आती है, तो निर्वाचित उम्मीदवार का चुनाव रद्द किया जा सकता है। इस तरह चुनाव परिणाम को निरस्त करने के लिए ठोस आधार और कानूनी प्रक्रिया का पूरा होना जरूरी है।
क्या विपक्ष की मांग पर दोबारा हो सकता है मतदान?
विपक्ष की ओर से पिछले दो वर्षों में हुए कई राज्यों के चुनाव रद्द करने की मांग की जा रही है, लेकिन केवल राजनीतिक मांग के आधार पर दोबारा चुनाव नहीं कराया जा सकता। इसके लिए चुनाव में हुई गंभीर अनियमितताओं को कानून के तहत साबित करना होगा।
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनावों के संचालन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान गंभीर गड़बड़ी की स्थिति में प्रभावित बूथ या क्षेत्र में दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया जा सकता है। वहीं, चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की जा सकती है।
इसका मतलब है कि किसी पूरे राज्य या कई राज्यों में एक साथ चुनाव रद्द कराने के लिए सिर्फ आरोप पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए संबंधित कानूनी आधार और सक्षम प्राधिकारी या अदालत का फैसला जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, हर विधानसभा सीट का चुनाव अलग
किसी राज्य का पूरा विधानसभा चुनाव एक साथ रद्द कराने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया भी महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, विधानसभा चुनाव को एक इकाई मानकर चुनौती नहीं दी जा सकती। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का चुनाव अलग होता है। इसलिए किसी सीट पर दोबारा चुनाव कराने की मांग के लिए उसी सीट पर गड़बड़ी साबित करनी होगी।
ऐसे में केवल सामूहिक आरोपों या राजनीतिक मांग के आधार पर किसी राज्य या कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम रद्द नहीं किए जा सकते। हर निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े मामले को उसके तथ्यों और कानूनी आधारों के आधार पर देखना होगा।