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Bombay High Court: “पुलिस जनता की सेवक है, PM या CM की नहीं”-‘सरकार मुर्दाबाद’ के नारों पर बॉम्बे हाई कोर्ट की सबसे सख्त टिप्पणी, तड़ीपार का आदेश रद्द

news desk
Last updated: July 3, 2026 3:24 pm
news desk
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मुंबई। लोकतंत्र में असहमति और विरोध के अधिकार को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा है कि किसी भी नागरिक को केवल इसलिए उसके शहर या क्षेत्र से बाहर (Extern/तड़ीपार) नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने सरकार की नीतियों का विरोध किया या सरकार के खिलाफ नारे लगाए।

Contents
पुलिस की भूमिका पर कोर्ट का सीधा प्रहार: “आप मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के नौकर नहीं”क्या था पूरा मामला? (2019 से 2024 के प्रदर्शनों का सच)संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 की ढालअदालत की लक्ष्मण रेखा: विरोध शांतिपूर्ण होना जरूरी

यह ऐतिहासिक टिप्पणी जस्टिस माधव जामदार ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महाराष्ट्र महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। मुंबई पुलिस ने सईद अहमद को एक साल के लिए मुंबई और उसके उपनगरों की सीमा से बाहर (तड़ीपार) रहने का फरमान सुनाया था, जिसे हाई कोर्ट ने पूरी तरह खारिज और रद्द कर दिया।

पुलिस की भूमिका पर कोर्ट का सीधा प्रहार: “आप मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के नौकर नहीं”

सुनवाई के दौरान जस्टिस माधव जामदार ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए और मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा:

“यदि कोई व्यक्ति ‘सरकार मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाता है, तो क्या केवल इसी आधार पर उसे शहर से बाहर निकाल दिया जाएगा? पुलिस का बुनियादी काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि लोकतांत्रिक तरीके से हो रहे विरोध को बेरहमी से दबाना।”

जस्टिस जामदार ने पुलिस को उसकी असली जिम्मेदारी याद दिलाते हुए आगे कहा कि “पुलिस किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि इस देश की जनता की सेवक है।” कोर्ट ने आगाह किया कि यदि जनता के हर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर मुकदमे दर्ज किए जाएंगे, तो इससे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ही कमजोर हो जाएगी।

क्या था पूरा मामला? (2019 से 2024 के प्रदर्शनों का सच)

याचिकाकर्ता सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी के खिलाफ साल 2019 से 2024 के बीच पुलिस ने कई एफआईआर (FIR) दर्ज की थीं।

  • इन मुद्दों पर किया था विरोध: यह सभी मामले मुख्य रूप से विभिन्न सरकारी नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण धरनों और रैलियों से जुड़े थे। इनमें नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), बाबरी मस्जिद विध्वंस, ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, वक्फ बोर्ड में कथित भ्रष्टाचार और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ हुए प्रदर्शन शामिल थे।
  • पुलिस का एक्शन: इन दर्ज मुकदमों को आधार बनाकर महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत उन्हें 12 महीने के लिए मुंबई से निष्कासित करने का आदेश जारी कर दिया गया था, जिसे अब कोर्ट ने असंवैधानिक माना है।

संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 की ढाल

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (Article 19) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होकर अपनी असहमति दर्ज कराने का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 21 (Article 21) गरिमा के साथ जीवन जीने और अपनी पसंद के स्थान पर रहने के अधिकार की रक्षा करता है।

अदालत ने माना कि केवल सरकार की तीखी आलोचना करना या प्रदर्शनों का हिस्सा बनना किसी को उसके घर और शहर से बेदखल करने का कानूनी आधार कभी नहीं हो सकता।

अदालत की लक्ष्मण रेखा: विरोध शांतिपूर्ण होना जरूरी

नागरिक अधिकारों की पैरवी करने के साथ ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक जरूरी लक्ष्मण रेखा भी खींची। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विरोध प्रदर्शन हमेशा कानून के दायरे में और पूरी तरह शांतिपूर्ण होना चाहिए। यदि कोई भी व्यक्ति विरोध की आड़ में हिंसा फैलाता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है या किसी दंडनीय अपराध में शामिल पाया जाता है, तो पुलिस उसके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

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TAGGED: Article 19 Right to Protest High Court, Bombay High Court Verdict on Externment, Government Murdabad Slogans Court Case, Justice Madhav Jamdar Comments, Maharashtra Police Act News Hindi., SDPI Leader Saeed Ahmad Mumbai
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