सेहत

सिर्फ फेफड़ों ही नहीं, दिमाग का भी दुश्मन है वायु प्रदूषण! याददाश्त पर पड़ सकता है 10 साल उम्र बढ़ने जितना असर

नई दिल्ली: वायु प्रदूषण को अब तक फेफड़ों और हृदय से जुड़ी बीमारियों का बड़ा कारण माना जाता रहा है, लेकिन एक नए अध्ययन ने इसके दिमाग पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। शोधकर्ताओं का दावा है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता पर ऐसा असर पड़ सकता है, जो प्राकृतिक रूप से 10 साल उम्र बढ़ने के बराबर माना जा सकता है।

अध्ययन में सामने आया है कि हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषक कण केवल श्वसन तंत्र को ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को भी प्रभावित कर सकते हैं। इससे स्मरण शक्ति कमजोर होने के साथ-साथ संज्ञानात्मक क्षमताओं में भी गिरावट आ सकती है।

20 साल तक प्रदूषण में रहने वालों पर हुआ अध्ययन

यह शोध अमेरिकी संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया, जिसमें लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने वाले लोगों के मस्तिष्क स्वास्थ्य का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के दौरान विशेष रूप से सूक्ष्म कणों के प्रभाव को समझने की कोशिश की गई।

शोधकर्ताओं ने पाया कि लगभग दो दशकों तक अधिक प्रदूषित वातावरण में रहने वाले लोगों की स्मरण क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर थी। उनकी तथ्यों, शब्दों और सामान्य जानकारी को याद रखने की क्षमता का परीक्षण किया गया, जिसमें प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले प्रतिभागियों का प्रदर्शन कम पाया गया।

दिमाग की इस क्षमता पर सबसे ज्यादा असर

अध्ययन के अनुसार, प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव ‘सिमेंटिक मेमोरी’ पर देखा गया। यह दिमाग की वह क्षमता होती है, जिसके जरिए व्यक्ति शब्दों, उनके अर्थ, अवधारणाओं और सामान्य ज्ञान को याद रखता है और रोजमर्रा के जीवन में उनका उपयोग करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सिमेंटिक मेमोरी प्रभावी संवाद, भाषा की समझ, जानकारी को संसाधित करने और निर्णय लेने जैसी कई महत्वपूर्ण मानसिक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक होती है।

कहां से बढ़ रहा है प्रदूषण का खतरा?

शोध में बताया गया कि जंगलों में लगने वाली आग, जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन, अधिक ईंधन खपत वाले वाहन और तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत बन रहे हैं। इनसे निकलने वाले सूक्ष्म कण वातावरण की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे प्रदूषक लंबे समय तक शरीर में प्रवेश कर मस्तिष्क तक भी पहुंच सकते हैं, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता

विशेषज्ञों के अनुसार, यह अध्ययन उन वैज्ञानिक प्रमाणों को और मजबूत करता है जो वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संबंध को दर्शाते हैं। अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि प्रदूषित हवा का असर केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकती है।

वायु गुणवत्ता सुधारने पर जोर

शोधकर्ताओं ने कहा कि वायु गुणवत्ता में सुधार और हानिकारक प्रदूषकों के लंबे समय तक संपर्क को कम करना बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि स्वच्छ हवा न केवल फेफड़ों और हृदय की सुरक्षा के लिए आवश्यक है, बल्कि दिमाग की कार्यक्षमता और याददाश्त को स्वस्थ बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

 

vineet verma

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