नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच एक सवाल दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर छोटा सा देश इजरायल एक साथ कई मोर्चों पर सैन्य अभियान चलाने की आर्थिक ताकत कहां से जुटाता है। एक ओर ईरान के साथ टकराव और दूसरी ओर लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई के बीच इजरायल लगातार अपने सैन्य अभियानों को जारी रखे हुए है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि युद्ध की भारी लागत के बावजूद उसकी आर्थिक मशीनरी कैसे काम कर रही है।
क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से छोटा होने के बावजूद इजरायल ने खुद को सैन्य और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत बनाया है। यही वजह है कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों के बीच भी उसकी रक्षा क्षमता कमजोर पड़ती नहीं दिख रही।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2023 से अप्रैल 2026 तक बहुस्तरीय सैन्य अभियानों पर इजरायल करीब 138 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। वहीं ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों पर शुरुआती महीनों में ही लगभग 12 अरब डॉलर का खर्च आया।
युद्ध के बढ़ते खतरे को देखते हुए इजरायल ने वर्ष 2026 के लिए अपने इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा बजट भी मंजूर किया है। कुल राष्ट्रीय बजट का बड़ा हिस्सा सेना और सुरक्षा तैयारियों पर खर्च किया जा रहा है।
इजरायल की सैन्य ताकत के पीछे अमेरिका का बड़ा योगदान माना जाता है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से रक्षा सहयोग समझौते मौजूद हैं, जिनके तहत इजरायल को हर साल अरबों डॉलर की सैन्य सहायता मिलती है।
युद्ध जैसी परिस्थितियों में अमेरिकी संसद अतिरिक्त आपातकालीन सहायता पैकेज भी मंजूर करती रही है। इस धनराशि का उपयोग उन्नत हथियार, लड़ाकू विमान, मिसाइल सिस्टम और रक्षा तकनीक खरीदने में किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल की सबसे बड़ी ताकत उसकी मजबूत तकनीकी अर्थव्यवस्था है। देश को दुनिया के प्रमुख स्टार्टअप हब में गिना जाता है। कई वैश्विक तकनीकी कंपनियों के अनुसंधान और विकास केंद्र इजरायल में संचालित होते हैं।
तकनीक और नवाचार आधारित उद्योगों से सरकार को बड़े पैमाने पर कर राजस्व मिलता है, जो रक्षा खर्च को संभालने में मदद करता है। प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी इजरायल दुनिया के समृद्ध देशों में शामिल है।
इजरायल का रक्षा उत्पादन तंत्र भी बेहद मजबूत माना जाता है। देश में कई सरकारी और निजी रक्षा कंपनियां आधुनिक हथियार, ड्रोन, मिसाइल और अन्य सैन्य उपकरण तैयार करती हैं।
युद्ध के दौरान घरेलू उत्पादन क्षमता इजरायल को बाहरी निर्भरता से बचाती है। इसके अलावा हथियारों के निर्यात से भी देश को बड़ी आय प्राप्त होती है।
युद्ध खर्च को पूरा करने के लिए इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों से कर्ज भी लिया है। इसके साथ ही कर व्यवस्था में बदलाव कर अतिरिक्त राजस्व जुटाने की कोशिश की गई है।
विश्लेषकों का कहना है कि देश की जनता भी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मानती है, इसलिए आर्थिक दबाव के बावजूद सरकार को व्यापक समर्थन मिलता है।
दिलचस्प बात यह है कि आबादी और क्षेत्रफल में ईरान इजरायल से कई गुना बड़ा है, लेकिन आर्थिक उत्पादन के मामले में इजरायल काफी मजबूत स्थिति में दिखाई देता है।
यही आर्थिक क्षमता उसे आधुनिक हथियारों, उन्नत रक्षा प्रणालियों और लंबी सैन्य तैयारियों पर लगातार निवेश करने की ताकत देती है।
हालांकि लगातार संघर्षों का असर इजरायल की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है। आर्थिक विकास दर में कमी आई है, महंगाई बढ़ी है और कुछ क्षेत्रों में सरकारी खर्चों में कटौती करनी पड़ी है।
कई युवा पेशेवर और तकनीकी क्षेत्र के कर्मचारी सैन्य रिजर्व बलों में तैनात हैं, जिससे उद्योगों पर भी असर पड़ा है। इसके बावजूद मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और विकसित आर्थिक ढांचा देश को झटकों से उबरने में मदद कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इजरायल इस संघर्ष को केवल सैन्य या आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व से जुड़े मुद्दे के रूप में देखता है। यही कारण है कि आर्थिक दबाव बढ़ने के बावजूद सरकार और सुरक्षा तंत्र अपने अभियान जारी रखने पर जोर दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की सहायता, मजबूत तकनीकी अर्थव्यवस्था, घरेलू रक्षा उद्योग और वित्तीय संसाधनों के संयोजन ने इजरायल को क्षेत्रीय संघर्षों के बीच भी आर्थिक रूप से टिके रहने की क्षमता दी है।
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