नई दिल्ली: शारदीय नवरात्रि में नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के बाद अब विसर्जन की तैयारी की जा रही है। इस दौरान कलश, उसके ऊपर रखे नारियल, सिक्के, कलश के जल, अक्षत और ज्वारे को लेकर कई सवाल उठते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विसर्जन के बाद पूजा में इस्तेमाल हुई इन सामग्रियों का उपयोग विशेष विधि से किया जाता है। इस साल दुर्गा विसर्जन 20 अक्टूबर को होगा। इसके लिए शुभ मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से 3 बजकर 30 मिनट तक बताया गया है।
कलश के नारियल और सिक्के का क्या करें?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विसर्जन के बाद कलश पर रखा नारियल घर की किसी विवाहित महिला को दिया जा सकता है। दूसरा विकल्प यह है कि नारियल को लाल कपड़े में बांधकर घर के मंदिर में रख दें।
वहीं, कलश में रखा सिक्का निकालकर लाल कपड़े में बांधकर घर या दुकान की तिजोरी में रखने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि और बरकत बनी रहती है।
विसर्जन से पहले मां दुर्गा को रोली, अक्षत, फल, फूल, मिठाई और वस्त्र अर्पित करें। इसके बाद श्रद्धापूर्वक आरती करें और मां को सिंदूर अर्पित करें। परिवार के सदस्यों को भी सिंदूर लगाया जाता है।
कलश के जल और अक्षत का ऐसे करें इस्तेमाल
पूजा के बाद कलश में बचे जल को धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ माना जाता है। आम के पत्तों की मदद से इस जल का पूरे घर में छिड़काव करें। बचा हुआ जल किसी पौधे या गमले में डाल सकते हैं। परंपरा के अनुसार, परिवार के सदस्यों पर भी जल छिड़का जाता है।
कलश में रखे अक्षत को लाल कपड़े में बांधकर घर के मुख्य द्वार पर टांगने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मकता बनी रहती है और नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है।
ज्वारे का विसर्जन कैसे करें?
अगर आपने नवरात्रि में ज्वारे बोए हैं, तो विसर्जन के समय उन्हें श्रद्धापूर्वक अपने कान पर रखें। इसके बाद उन्हें किसी पवित्र नदी या तालाब में विसर्जित करने की परंपरा है।
मां दुर्गा की प्रतिमा को जयकारों और भजन-कीर्तन के साथ विसर्जन स्थल तक ले जाया जाता है। वहां प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार विसर्जन किया जाता है। जल स्रोत में विसर्जन करते समय स्थानीय नियमों और पर्यावरण संबंधी निर्देशों का पालन करना भी जरूरी है।
विसर्जन से पहले इन बातों का रखें ध्यान
मां दुर्गा के विसर्जन से पहले पूजा की परंपराओं के अनुसार उनका आभार व्यक्त करें। मां जया-विजया के पूजन के साथ शमी और अपराजिता की पूजा करने की भी परंपरा बताई गई है। श्रद्धालु माता रानी से सुख, समृद्धि और विजय का आशीर्वाद मांगते हैं।
कलश के नारियल, सिक्के, जल, अक्षत और ज्वारे के उपयोग से जुड़ी विधियां अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा या पूजा कराने वाले पुरोहित के निर्देशों का ध्यान रखें।