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कैसे हुआ 20 साल की लेखिका को दोगुने उम्र के शख्स से प्यार? समाज और विवाह के बंधन से मुक्त हो कर निभाया आजीवन प्रेम!

news desk
Last updated: November 7, 2025 6:33 pm
news desk
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प्रभा खेतान - एआई जेनेरेटड फोटो
प्रभा खेतान - एआई जेनेरेटड फोटो
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स्त्रीवादी लेखिका प्रभा खेतान एक ऐसी महिला, जो न सिर्फ अपने लेखन की निर्भीकता और जीवन की सच्चाइयों के कारण हमेशा सुर्खियों में रहीं बल्कि अपने प्रेम संबंधों को लेकर भी बेबाक रही.

अपनी आत्मकथा में प्रभा खेतान ने न सिर्फ एक लेखिका के संघर्षों को उकेरा, बल्कि अपने हृदय की गहराइयों में बसे उस पुरुष के प्रति प्रेम को भी खुलकर लिखा. जिसे वह स्नेह से ‘डॉ. साहब’ कहा करती थीं. वह विवाहित थे, उनका परिवार था, बच्चे थे पर फिर भी प्रभा उनसे गहरा प्रेम करती थीं और आजीवन उन्होंने इस प्रेम को निभाया भी.  

उस पुरूष से प्रभा खेतान की पहली मुलाकात ऐसी थी जैसे किसी कहानी का पहला पन्ना हो,अनकहे एहसासों और हल्की मुस्कान से भरा हुआ. प्रभा उन दिनों अपनी आंखों का चेक-अप करवाने के लिए एक क्लीनिक गई थीं. वहीं, पहली बार उनकी मुलाकात उस डॉक्टर से हुई, जो आगे चलकर उनकी ज़िंदगी में सबकुछ बना गया.

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डॉक्टर ने जैसे ही पेंटास्कोप से प्रभा की आंखों की जांच शुरू की, कुछ बदल गया था. शायद उसी पल उन्होंने प्रभा की आंखों में एक पूरी दुनिया देख ली थी, जहां थी गहराई, संवेदना और एक अनोखी चमक.

जांच खत्म होने से पहले ही उनके दिल की धड़कनें जैसे कोई स्वीकारोक्ति दे चुकी थीं. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, ‘ इतनी सुंदर आंखें मैंने आज तक नहीं देखीं.’ 

प्रभा अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखती हैं कि डॉ साहब के उस पहले स्पर्श ने उन्हें भीतर तक सहला दिया था. ‘पहली बार किसी पुरूष ने मुझे अपनी हथेलियों में भरा और पहली बार कोई पुरूष मुझसे कह रहा था कि तुम कितनी आकर्षक हो…पहली बार किसी की बांहों में मैंने खुद को इतना सुरक्षित महसूस किया था.’

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प्रभा उन क्षणों के बारे में लिखती हैं कि उन्होंने धीरे से अपना सर डॉ साहब के कन्धे पर रख दिया. डॉ साहब और उनके कमरे में दवाओं की वह खुशबू, मुझे बेहद लुभा रही थी. उन्होंने मेरी पलकों को हल्के से चूमा, फिर गालों को… पर अगले ही पल अचानक से डॉक्टर साहब ने उन्हें हटा दिया और वापस अपनी मेज पर जा बैठे. न जाने क्यों उस समय उनके चेहरे पर क्रोध झलक आया था. वे प्रिसक्रिप्शन लिखने लगे थे और काफी परेशान नजर आ रहे थे.

तब प्रभा ने उनकी आंखों में झांकते हुए प्रेम से कहा- ‘मैं इन क्षणों को हमेशा के लिए संजोकर रखना चाहूंगी.’

पर वे भड़क उठे- ‘बेवकूफ मत बनो. जानती हो तुम क्या कह रही हो ?’

इस आवाज की सख्ती से वह सहम गईं और कुर्सी के पीछे जाकर खड़ी हो गई. उनकी आंखों में आंसू आ गये- ‘आप क्या चाहते हैं मैं समझ नहीं पा रही?’

‘क्योंकि तुम समझना नहीं चाहतीं’

प्रभा को रूलाई आ जाती है. 

तब डॉ साहब ने उनकी ओर कातर नजरों से देखते हुए कहा कि ‘हमें फिर कभी नहीं मिलना चाहिए.’ उनकी यह बात सुनकर प्रभा रो पड़ती हैं. डॉक्टर साहब की हथेलियों को दबाते हुए वह कहती हैं ‘आपसे मैं नहीं मिलूं, मेरे लिए यह सम्भव नहीं.’ उनकी आवाज कांप रही थी- ‘मैं जोखम लेने से नहीं घबराती. यदि आप मेरे साथ हैं तो मुझे किसी का डर नहीं.’

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डॉ साहब हैरानी से कहते हैं कि ‘तुम्हारे ये शब्द मेरे लिए बड़े अपरिचित हैं. किसी भी स्त्री के लिए, मेरे जैसे आदमी से प्यार करना बड़ा कठिन है. और फिर प्यार की मेरी उम्र भी नहीं… विवाहित हूं, दो लड़के, तीन लड़कियों का पिता हूं. चालीस से ऊपर की उम्र है. खुद अपनी नजर में यह सारी बातें मुझे बड़ी अजीब लग रही हैं, आखिर ऐसा क्या है मुझमें ?’

तब प्रभा अपनी हथेलियों में उनका चेहरा भरते हुए बोलती हैं-‘कुछ नहीं, लेकिन आपके लिए मुझे हर स्थिति मंजूर है.’

वे लिखती हैं कि ‘मैंने उन्हें अपनी बांहों में खींच लिया था, इससे पहले वे कुछ कहें मैं उन्हें पागलों की तरह चूम रही थी. वे रो पड़े थे मेरी बांहों में. अपने दुपट्टे से उनके आंसू पोंछते हुए कह रही थी ‘छिः रोते नहीं…’ सान्त्वना के मेरे शब्द उनके आंसुओं के साथ पिघल रहे थे.’

उस एक मुलाकात के बाद जैसे वक्त ठहर गया था. प्रभा और डॉक्टर साहब का रिश्ता सिर्फ मुलाकातों का नहीं था. वह आत्माओं का जुड़ाव था, जो हर सामाजिक परिभाषा से परे था. 

प्रभा ने अपने इस रिलेशनशिप के बारे में कहा है कि – ‘मैं क्या लगती थी डॉक्टर साहब की ? मैं क्यों ऐसे उनके साथ चली आई ? प्रियतमा, मिस्ट्रेस या शायद आधी पत्नी ? पूरी पत्नी तो मैं कभी नहीं बन सकती क्योंकि एक पत्नी पहले से मौजूद थी. वे बाल-बच्चों वाले व्यक्ति थे. पिछले बीस सालों से में उनके साथ थी मगर किस रूप में…? इस रिश्ते को… नाम नहीं दे पाऊंगी. जो भी हो, मैं डॉक्टर साहब से प्यार करती थी. मैंने स्वेच्छा से अपने इस अकेले जीवन का वरण किया है. क्या ऐसा कभी घटता नहीं? क्या विवाहित व्यक्ति से एक कुंआरी लड़की कभी प्रेम नहीं करती ?’

प्रभा खेतान की यह प्रेमकथा सिर्फ एक व्यक्तिगत कहानी नहीं, बल्कि उस स्त्री की कहानी है जिसने अपने समय के सामाजिक बंधनों को तोड़कर जीने और प्रेम करने का साहस किया. उन्होंने दिखाया कि प्रेम कभी गलत नहीं होता. गलत सिर्फ वे सीमाएं होती हैं जिन्हें समाज ने प्रेम के चारों ओर खींच रखा है.

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