अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर राजनीतिक और फिल्मी जगत में विवाद छिड़ गया है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों का समर्थन करते हुए उन्होंने केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और लोकतंत्र को लेकर सवाल उठाए थे। इसके बाद केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू, महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे और अभिनेता पुनीत इस्सर ने उनके बयान की आलोचना की।
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह एक बार फिर अपने राजनीतिक विचारों को लेकर चर्चा में हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग कर रहे छात्रों के समर्थन में दिए गए उनके बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। शाह ने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ बताते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा था।
उनके इस बयान के बाद बीजेपी नेताओं और अभिनेता पुनीत इस्सर ने तीखी प्रतिक्रिया दी। जहां केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने शाह की टिप्पणी पर नाराजगी जताई, वहीं पुनीत इस्सर ने उन पर राजनीतिक मुद्दों पर चुनिंदा प्रतिक्रिया देने का आरोप लगाया। इस विवाद ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकार की आलोचना और कलाकारों की राजनीतिक भूमिका को लेकर बहस छेड़ दी है।
नसीरुद्दीन शाह ने खुद को क्यों बताया ‘दिमागी नक्सल’?
नसीरुद्दीन शाह ने मंगलवार को फेसबुक पर एक वीडियो साझा किया था। इसमें उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ लिखा बैज दिखाते हुए केंद्र सरकार की आलोचना की। शाह ने आरोप लगाया कि सरकार देश की शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है, युवाओं का हौसला तोड़ रही है और लोकतंत्र के सामने चुनौतियां खड़ी कर रही है।
उन्होंने अपने वीडियो में सवाल उठाया कि सरकार युवाओं के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था को लेकर आखिर किस हद तक जाएगी। अभिनेता ने यह भी कहा कि सरकार के आलोचकों को राष्ट्रविरोधी और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जैसे नाम दिए जाते हैं।
शाह की यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुछ छात्र छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। अभिनेता ने छात्रों के समर्थन में अपनी बात रखी थी।
किरण रिजिजू ने नसीरुद्दीन शाह पर क्या कहा?
केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर नसीरुद्दीन शाह के बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा कि वह पहले शाह को एक सामान्य अभिनेता मानते थे और उनका सम्मान करते थे, लेकिन अब उन्हें उनके बारे में अलग राय बनी है।
रिजिजू ने शाह के लिए ‘अर्बन दिमागी नक्सली’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उनके बयान को लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह बताया।
केंद्रीय मंत्री की इस प्रतिक्रिया के बाद विवाद ने राजनीतिक रंग ले लिया। शाह के बयान को लेकर समर्थकों और आलोचकों के बीच बहस तेज हो गई है।
पुनीत इस्सर बोले- सरकार पसंद नहीं तो चुनाव लड़िए
अभिनेता पुनीत इस्सर ने भी नसीरुद्दीन शाह की टिप्पणी पर सवाल उठाए। उन्होंने शाह को वरिष्ठ कलाकार और अपना शिक्षक बताते हुए उनके अभिनय की तारीफ की, लेकिन उनके राजनीतिक रुख की आलोचना की।
पुनीत इस्सर का कहना था कि किसी भी व्यक्ति को अपने विचार रखने और सरकार की आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देते समय निष्पक्षता भी जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि शाह कुछ खास विचारधारा से जुड़े मुद्दों पर ही खुलकर बोलते हैं।
इस्सर ने आगे कहा कि अगर किसी को मौजूदा सरकार की नीतियां पसंद नहीं हैं, तो उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव लड़कर सत्ता बदलने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा सरकार जनता के वोट से सत्ता में आई है।
उनकी टिप्पणी के बाद यह बहस और तेज हो गई कि सरकार की आलोचना करने वाले लोगों से राजनीतिक विकल्प पेश करने की अपेक्षा करना कितना उचित है।
नितेश राणे ने भी साधा निशाना
महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे ने भी नसीरुद्दीन शाह पर निशाना साधा। उन्होंने अभिनेता की मानसिक स्थिति को लेकर व्यक्तिगत टिप्पणी की और आरोप लगाया कि शाह पाकिस्तान के पक्ष में बात करते हैं।
राणे ने यह भी कहा कि फिल्मों में शाह के पास अब ज्यादा काम नहीं बचा है। उनकी इस टिप्पणी को अभिनेता पर व्यक्तिगत हमला माना जा रहा है।
हालांकि, राणे के आरोपों के समर्थन में खबर में कोई स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें उनके राजनीतिक बयान और आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
पहले भी शिक्षा और छात्र आंदोलनों पर उठा चुके हैं आवाज
नसीरुद्दीन शाह इससे पहले भी शिक्षा व्यवस्था और छात्र आंदोलनों से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रख चुके हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उन्होंने नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों पर सरकार की प्रतिक्रिया की आलोचना की थी।
इसके अलावा, उन्होंने सत्यजीत रे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के छात्रों के समर्थन में भी आवाज उठाई थी। ये छात्र परिसर में हुई हिंसक घटनाओं के विरोध में धरने पर बैठे थे।
शाह की इन टिप्पणियों से स्पष्ट है कि वह शिक्षा, लोकतंत्र और छात्र आंदोलनों से जुड़े मामलों पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखते रहे हैं। हालांकि, उनके विचारों से सहमति और असहमति का मुद्दा अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राजनीतिक जवाबदेही
नसीरुद्दीन शाह के बयान पर छिड़ा विवाद केवल एक अभिनेता की टिप्पणी तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल भी है कि क्या कलाकारों को सरकार की नीतियों की आलोचना करने पर राजनीतिक निशाने का सामना करना चाहिए और क्या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों से सभी मुद्दों पर समान रूप से बोलने की अपेक्षा की जा सकती है।
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना नागरिकों का अधिकार है। वहीं, राजनीतिक दलों और सार्वजनिक हस्तियों को आलोचना का जवाब देने का भी अधिकार है। हालांकि, किसी भी बहस में व्यक्तिगत आरोपों के बजाय तथ्यों और मुद्दों पर चर्चा करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
फिलहाल, नसीरुद्दीन शाह के ‘दिमागी नक्सल’ बयान ने राजनीतिक और फिल्मी जगत में नई बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि इस विवाद पर अभिनेता की ओर से कोई नई प्रतिक्रिया आती है या मामला आगे भी राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है।