नई दिल्ली: बिना किसी ठोस वजह के विधायक पद से इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने वाले नेताओं से उपचुनाव का खर्च वसूलने की मांग अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। इस मामले में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, तमिलनाडु के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य के छह पूर्व विधायकों समेत अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में ऐसे नेताओं पर आर्थिक जवाबदेही तय करने के साथ पांच साल तक चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की भी मांग की गई है।
क्या इस्तीफा देने वाले विधायकों से वसूला जाएगा चुनाव का खर्च?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। याचिका में मांग की गई है कि यदि कोई विधायक कानूनी रूप से मान्य ठोस कारण के बिना अपनी सीट छोड़ता है और इसके चलते उपचुनाव कराना पड़ता है, तो उससे चुनाव पर हुए सरकारी खर्च की वसूली की व्यवस्था बनाई जाए।
यह मामला इसलिए अहम है, क्योंकि उपचुनाव कराने में सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल होता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि बिना पर्याप्त वजह इस्तीफा देने वाले जनप्रतिनिधियों के फैसले से सरकारी खजाने पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
यह याचिका वकील के. सुथन ने दाखिल की है। उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें विधायकों के स्वैच्छिक इस्तीफे के बाद होने वाले उपचुनावों के खर्च को लेकर वित्तीय जवाबदेही तय करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी गई थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत से ‘चुनाव व्यय सुरक्षा’ व्यवस्था लागू करने का निर्देश देने की मांग की है। इसके तहत बिना कानूनी रूप से मान्य ठोस कारण के इस्तीफा देने वाले विधायक को दोबारा चुनाव लड़ने से पहले संबंधित उपचुनाव की लागत के बराबर राशि जमा करनी होगी।
इसके अलावा, याचिका में ऐसे विधायकों को पांच साल तक चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की मांग भी की गई है।
तमिलनाडु के 6 विधायकों के इस्तीफे से क्यों उठा सवाल?
याचिका में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद हुए घटनाक्रम का उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि 4 मई को चुनाव नतीजे घोषित होने के कुछ सप्ताह के भीतर एआईएडीएमके के छह विधायकों ने अपनी सीटों से इस्तीफा दे दिया और बाद में सत्तारूढ़ पार्टी में शामिल हो गए।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, इनमें से कुछ विधायकों के खिलाफ विश्वास प्रस्ताव के दौरान पार्टी व्हिप के विपरीत मतदान करने के आरोप में अयोग्यता की कार्यवाही शुरू हुई थी। याचिका में दावा किया गया है कि इस्तीफों से इन विधायकों को लंबित कार्यवाही से बचने और दूसरे राजनीतिक दल के बैनर तले फिर से चुनाव लड़ने का रास्ता मिला।
याचिका में यह भी कहा गया है कि इन इस्तीफों के कारण हुए उपचुनावों से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा। हालांकि, ये याचिकाकर्ता के आरोप और तर्क हैं, जिन पर संबंधित पक्षों का जवाब आना बाकी है।
2004 में भी उठी थी उपचुनाव के खर्च की वसूली की मांग
याचिका में चुनाव सुधारों से जुड़े वर्ष 2004 के एक प्रस्ताव का भी हवाला दिया गया है। इसके अनुसार, चुनाव आयोग ने सुझाव दिया था कि अपनी सीट छोड़ने के कारण उपचुनाव की स्थिति पैदा करने वाले उम्मीदवारों से चुनाव का खर्च वसूलने पर विचार किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस सिफारिश को अब तक लागू नहीं किया गया है। इसी आधार पर उन्होंने ऐसी व्यवस्था बनाने की मांग की है, जिससे बिना ठोस कारण इस्तीफा देने वाले विधायकों की वित्तीय जवाबदेही तय हो सके।
मद्रास हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका?
मद्रास हाईकोर्ट ने 24 सितंबर को याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उपचुनाव के खर्च के बराबर राशि जमा कराने और पांच साल की अयोग्यता जैसी शर्तें लागू करने के लिए चुनावी कानून में नए प्रावधानों की जरूरत होगी।
हाईकोर्ट के मुताबिक, इस तरह की व्यवस्था एक नया वित्तीय और दंडात्मक ढांचा तैयार करने जैसी होगी। यह न्यायिक निर्देशों के बजाय विधायी नीति के दायरे में आता है।
अदालत ने यह भी कहा था कि विधानसभा की सीट से इस्तीफा देने का अधिकार सदन की सदस्यता से जुड़ी संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे अधिकार पर न्यायिक आदेश के जरिए अतिरिक्त वैधानिक शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं।
अब सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है। मामले में आगे क्या रुख सामने आता है, यह उनके जवाब और अदालत की आगामी सुनवाई पर निर्भर करेगा।