घर का खर्च चलाना हो, बच्चों की फीस भरनी हो या कारोबार के लिए पैसों की जरूरत हो, भारतीय परिवार तेजी से अपने सोने के गहनों को कर्ज जुटाने का जरिया बना रहे हैं। सोने की बढ़ती कीमतों के बीच गोल्ड लोन का चलन बढ़ रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच साल में गोल्ड लोन लेने वालों की संख्या में करीब 35% की बढ़ोतरी हुई है और लगभग 2,200 टन सोना गिरवी रखा गया है। यह रुझान बताता है कि भारतीय परिवारों के लिए सोना अब केवल आभूषण या निवेश नहीं, बल्कि जरूरत के समय नकदी जुटाने का साधन भी बन रहा है।
लोन से तुरंत पैसा मिल सकता है, लेकिन इसकी एक बड़ी शर्त है। अगर कर्ज लेने वाला तय समय पर भुगतान नहीं करता, तो बैंक या गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) नियमों के अनुसार गिरवी रखे सोने की नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। ऐसे में आर्थिक संकट से निकलने के लिए लिया गया कर्ज परिवार की जमा-पूंजी पर भी भारी पड़ सकता है।
भारतीय परिवारों के पास कितना सोना?
भारत में सोने का सामाजिक और आर्थिक महत्व काफी पुराना है। शादी-ब्याह, पारिवारिक बचत और भविष्य की सुरक्षा के लिए लोग लंबे समय से सोना खरीदते रहे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटीज मार्केट्स (NISM) के निदेशक के हवाले से मार्च 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय परिवारों के पास करीब 30,000 से 35,000 टन सोना है, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 450 लाख करोड़ रुपये बताई गई है।
सोने की कीमत बढ़ने से परिवारों के पास मौजूद गहनों की बाजार कीमत भी बढ़ सकती है। इससे पात्र गहनों को गिरवी रखने पर मिलने वाले कर्ज की संभावित रकम बढ़ती है। हालांकि, कर्ज की वास्तविक राशि सोने की शुद्धता, उसके शुद्ध वजन, लागू मूल्यांकन नियमों और ऋणदाता की शर्तों पर निर्भर करती है।
आखिर क्यों बढ़ रहा गोल्ड लोन का चलन?
1. घरेलू खर्च पूरे करने के लिए
महंगाई के बीच परिवारों को किराया, राशन, बच्चों की फीस, इलाज और अन्य जरूरी खर्चों के लिए अतिरिक्त पैसों की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे समय में घर में रखे सोने को गिरवी रखकर तत्काल वित्तीय जरूरत पूरी करने का विकल्प चुना जाता है।
2. कारोबार के लिए पैसों की जरूरत
छोटे कारोबारियों, दुकानदारों और स्वरोजगार करने वालों को कभी-कभी कारोबार चलाने, माल खरीदने या भुगतान करने के लिए पूंजी की जरूरत होती है। पात्र मामलों में गोल्ड लोन इस जरूरत को पूरा करने का एक विकल्प बन सकता है।
3. सोना बेचे बिना नकदी जुटाने की सुविधा
कई परिवार सोने को भविष्य की सुरक्षा और भावनात्मक संपत्ति मानते हैं। ऐसे में गहने बेचने के बजाय उन्हें गिरवी रखना बेहतर विकल्प लग सकता है। कर्ज और लागू शुल्क चुकाने के बाद गहने वापस लेने का रास्ता बना रहता है।
4. सोने की बढ़ती कीमतों का असर
जब सोने का बाजार मूल्य बढ़ता है, तो पात्र गिरवी रखे गए सोने की स्वीकार्य कीमत भी बढ़ सकती है। इससे लागू लोन-टू-वैल्यू (LTV) सीमा के भीतर अधिक कर्ज मिलने की संभावना बनती है। हालांकि, सोने की कीमत बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि हर ग्राहक को पहले से अधिक कर्ज मिलना तय है।
RBI के नियम: कितने मूल्य तक मिल सकता है गोल्ड लोन?
भारतीय रिजर्व बैंक के 2025 के गोल्ड और सिल्वर लोन संबंधी निर्देशों में उपभोग के लिए दिए जाने वाले कर्ज पर अधिकतम लोन-टू-वैल्यू सीमा तय की गई है। वाणिज्यिक बैंकों के लिए 2026 में लागू निर्देशों के अनुसार, सीमा इस प्रकार है।
- 2.5 लाख रुपये तक का कर्ज: सोने के स्वीकार्य मूल्य का अधिकतम 85% तक
- 2.5 लाख रुपये से अधिक और 5 लाख रुपये तक: अधिकतम 80% तक
- 5 लाख रुपये से अधिक: अधिकतम 75% तक
ये अधिकतम सीमाएं हैं, गारंटीड लोन राशि नहीं। वास्तविक मंजूरी सोने के मूल्यांकन, शुद्धता, वजन, कर्ज की श्रेणी और ऋणदाता की शर्तों पर निर्भर करेगी।
कर्ज नहीं चुकाया तो क्या होगा?
गोल्ड लोन लेते समय सबसे बड़ा जोखिम गिरवी रखे गए गहनों को खोने का है। अगर ग्राहक निर्धारित शर्तों के मुताबिक भुगतान नहीं करता, तो ऋणदाता नियमानुसार वसूली और नीलामी की प्रक्रिया अपना सकता है।
इसीलिए कर्ज लेने से पहले ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस, भुगतान की अवधि, देरी पर लगने वाले शुल्क और नीलामी की शर्तों को समझना जरूरी है। यह भी देखना चाहिए कि आमदनी के हिसाब से किस्त या तय समय पर भुगतान करना संभव होगा या नहीं।
गोल्ड लोन को केवल इसलिए सस्ता या बेहतर विकल्प नहीं मानना चाहिए कि इसके बदले गहने गिरवी रखे जाते हैं। अलग-अलग बैंकों और NBFC की ब्याज दरों और शर्तों में अंतर हो सकता है।
सोना बना सहारा, लेकिन आर्थिक दबाव का संकेत भी
गोल्ड लोन की बढ़ती मांग के पीछे एक तरफ सोने की बढ़ती कीमतें और गहनों के बदले कर्ज मिलने की सुविधा है, तो दूसरी तरफ परिवारों और कारोबारियों की नकदी संबंधी जरूरतें भी हैं। इस लिहाज से गोल्ड लोन वित्तीय जरूरत पूरी करने का उपयोगी साधन हो सकता है, लेकिन लगातार घरेलू खर्च चलाने के लिए इस पर निर्भर रहना जोखिम बढ़ा सकता है।
परिवारों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि कर्ज लेने से पहले उसकी कुल लागत और भुगतान की क्षमता का आकलन करें। क्योंकि सोना जरूरत के समय आर्थिक सहारा जरूर बन सकता है, लेकिन भुगतान में चूक होने पर यही संपत्ति हाथ से निकलने का कारण भी बन सकती है।