कोलकाता के चोरबागान सार्वजनिक दुर्गा पूजा पंडाल में महासप्तमी की रात भगदड़ ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं। प्रत्यक्षदर्शियों ने भीड़ प्रबंधन, बैरिकेडिंग और सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। किसी ने पत्नी को खोया, तो किसी परिवार की इकलौती बेटी की मौत हो गई।
कोलकाता। दुर्गा पूजा के उत्सव में मां दुर्गा के दर्शन करने निकले श्रद्धालुओं के लिए महासप्तमी की रात कभी न भूलने वाला दर्द बन गई। कोलकाता के चोरबागान सर्वजनिन दुर्गा पूजा पंडाल में मची भगदड़ ने कई परिवारों को उजाड़ दिया। हादसे में अब तक 19 लोगों की मौत की खबर है, जबकि कई अन्य घायल बताए जा रहे हैं। इस घटना के बाद अब सवाल केवल मरने वालों की संख्या का नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का भी है, जिनमें पूजा के लिए जुटी भीड़ जानलेवा भगदड़ में बदल गई।
प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ित परिवारों के बयानों के मुताबिक, संकरी सड़क, भीड़ का दबाव, बारिश के दौरान लोगों की आवाजाही और कथित तौर पर अपर्याप्त सुरक्षा इंतजामों ने हालात को और भयावह बना दिया। हालांकि, हादसे के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच के बाद ही हो सकेगा।
बारिश के बीच बदले हालात, भीड़ में दबकर गई 13 साल की प्रांजल की जान
इस हादसे में अगरपारा से अपने परिवार के साथ दुर्गा पूजा देखने आई 13 वर्षीय प्रांजल सरकार की भी मौत हो गई। परिवार के लिए पूजा का यह सफर खुशियों से भरा था, लेकिन भगदड़ ने सब कुछ बदल दिया। बताया गया कि अचानक मची अफरातफरी के दौरान प्रांजल जमीन पर गिर गई और भीड़ के नीचे दब गई।
प्रांजल के चाचा ने अस्पताल पहुंचने के बाद के भयावह दृश्य का जिक्र किया। उनके मुताबिक, अस्पताल में कई शव रखे हुए थे और परिजनों के लिए अपनों की पहचान करना बेहद मुश्किल हो रहा था। भीड़ में कुचले जाने से मृतकों के चेहरों पर चोटों के निशान थे।
यह घटना एक बार फिर बड़े धार्मिक आयोजनों में बच्चों, बुजुर्गों और परिवारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। आखिर इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के बावजूद भीड़ को नियंत्रित करने के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं हो पाए?
पत्नी को नहीं बचा सका पति, चंद मिनटों में मातम में बदलीं खुशियां
नादिया से कोलकाता आए एक व्यक्ति ने उस रात की आपबीती सुनाते हुए बताया कि वह अपनी पत्नी और साली की बेटी के साथ पंडाल पहुंचे थे। उनके मुताबिक, बारिश शुरू होने के बाद बैरिकेडिंग से जुड़ी व्यवस्था में बदलाव हुआ और लोगों की आवाजाही अचानक बढ़ गई।
उन्होंने आरोप लगाया कि पंडाल के भीतर भीड़ बढ़ने के बाद सीटी बजाकर लोगों को बाहर निकलने के लिए कहा गया। संकरे रास्ते पर अचानक बढ़े दबाव के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई और उनकी पत्नी नीचे गिर गईं।
पीड़ित के मुताबिक, वह खुद भी भीड़ के दबाव में दूर जा गिरे और पत्नी को बचाने में नाकाम रहे। एक धार्मिक आयोजन में साथ आए परिवार के लिए कुछ ही मिनटों में जिंदगी का सबसे बड़ा दुख सामने आ गया।
इस दर्दनाक अनुभव के साथ भीड़ प्रबंधन का अहम सवाल जुड़ा है। यदि प्रवेश और निकास के रास्तों पर लोगों की आवाजाही नियंत्रित होती, तो क्या इस तरह की अफरातफरी को रोका जा सकता था? इसका जवाब जांच और सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा से ही सामने आएगा।
मां से छूटा 7 साल की बच्ची का हाथ, ICU में जिंदगी की जंग
भगदड़ के दौरान एक सात साल की बच्ची अपनी मां का हाथ छोड़कर गिर गई। बच्ची को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसे आईसीयू में ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखे जाने की जानकारी सामने आई है। उसके दादा के मुताबिक, पंडाल तक पहुंचने वाला रास्ता संकरा और अंधेरा था।
बच्ची की हालत ने उस खतरे को सामने ला दिया है, जिसका सामना भीड़भाड़ वाले आयोजनों में छोटे बच्चों और बुजुर्गों को करना पड़ता है। अचानक धक्का लगने या भीड़ का दबाव बढ़ने पर उनके लिए खुद को संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है।
इसी भगदड़ में 25 वर्षीय सोनू पाल की मां की भी मौत हो गई। सोनू ने बताया कि उनकी मां भीड़ के नीचे गिर गई थीं और वह उन्हें बचा नहीं सके। उन्होंने कहा कि हालात इतने भयावह थे कि खुद उनकी जान भी खतरे में पड़ गई थी।
नर्स बेटी की मौत से टूटी मां, पूछा- आखिर जिम्मेदार कौन?
हादसे में जान गंवाने वालों में एक नर्स भी शामिल बताई गई हैं, जो टाटा ऑन्कोलॉजी में काम करती थीं। उनकी मां के लिए बेटी को खोने का दुख असहनीय है। रोते हुए उन्होंने कहा कि उनकी इकलौती बेटी ही उनके परिवार की पूरी दुनिया थी।
बेटी की मौत के बाद मां ने सवाल उठाया कि जब देश में पहले भी भीड़ के कारण बड़े हादसे हो चुके हैं, तो धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा के इंतजामों को लेकर लापरवाही कैसे हो सकती है?
उनका सवाल सिर्फ अपने परिवार के लिए इंसाफ का नहीं, बल्कि उन सभी परिवारों के लिए जवाबदेही का है, जिन्होंने इस हादसे में अपनों को खो दिया। किसी भी सार्वजनिक आयोजन में सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी और क्या निर्धारित मानकों का पालन किया गया, इन सवालों की जांच जरूरी है।
VIP गेट पर सुरक्षा, आम श्रद्धालुओं के रास्ते पर इंतजामों की कमी के आरोप
हादसे के बाद स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस तथा पूजा समिति की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि पंडाल के सामने की सड़क संकरी थी और वहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जमा हो गए थे। कुछ लोगों ने दावा किया कि पुलिस की मौजूदगी वीआईपी प्रवेश द्वार के आसपास अधिक थी, जबकि आम श्रद्धालुओं की आवाजाही वाले रास्तों पर पर्याप्त सुरक्षा नहीं थी।
स्थानीय लोगों ने यह आरोप भी लगाया कि भगदड़ के बाद घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए तत्काल पर्याप्त एम्बुलेंस या प्रशासनिक वाहनों की व्यवस्था नजर नहीं आई। उनके मुताबिक, कुछ लोगों को स्थानीय निवासियों ने अपनी गाड़ियों से और दूसरे लोगों की मदद से अस्पताल पहुंचाया।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और आधिकारिक जांच के निष्कर्ष सामने आना बाकी हैं। लेकिन यदि आम श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश, निकास, आपातकालीन सहायता और भीड़ नियंत्रण के इंतजामों में कमी पाई जाती है, तो यह सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक मानी जाएगी।
दुर्गा पूजा जैसे बड़े आयोजनों में सुरक्षा की जवाबदेही कौन तय करेगा?
कोलकाता की यह त्रासदी कई जरूरी सवाल छोड़ गई है। क्या पंडाल की क्षमता के अनुरूप श्रद्धालुओं की संख्या नियंत्रित की गई थी? क्या प्रवेश और निकास के रास्ते पर्याप्त चौड़े और स्पष्ट थे? बारिश के दौरान भीड़ की आवाजाही के लिए क्या अलग योजना थी? क्या आपात स्थिति में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने और घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था मौजूद थी?
इन सवालों के जवाब केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा और जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही तय करने से मिलेंगे।
दुर्गा पूजा आस्था, परंपरा और सामुदायिक उत्सव का प्रतीक है। लेकिन किसी भी धार्मिक आयोजन में श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। चोरबागान की घटना का सबसे बड़ा सबक यही है कि भीड़ प्रबंधन में छोटी-सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। अब जरूरत है कि हादसे के कारणों की स्पष्ट जांच हो, पीड़ित परिवारों को सहायता मिले और भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।