नई दिल्ली: फेफड़ों के कैंसर का नाम आते ही अक्सर सिगरेट और तंबाकू की याद आती है। लेकिन क्या कोई व्यक्ति जिंदगीभर धूम्रपान से दूर रहने के बावजूद इस बीमारी की चपेट में आ सकता है? पोप लियो XIV को लंग एडेनोकार्सिनोमा होने की खबर के बाद यह सवाल चर्चा में है। 71 वर्षीय पोप के मामले ने एक बार फिर ध्यान दिलाया है कि फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों को ही नहीं होता।
दी गई जानकारी के मुताबिक, 13 अक्टूबर को रोम के एगोस्टिनो जेमेली पॉलीक्लिनिक में पोप के दाहिने फेफड़े के निचले हिस्से को निकालने के लिए सर्जरी की गई। नई दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. अंकित जैन के मुताबिक, तंबाकू के संपर्क में आए बिना भी फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। इसके पीछे आनुवंशिक बदलाव, वायु प्रदूषण और कुछ अन्य जोखिम कारक भूमिका निभा सकते हैं। कई मामलों में कैंसर होने की कोई एक निश्चित वजह सामने नहीं आ पाती।
नॉन-स्मोकर में भी कैंसर की वजह बन सकते हैं जीन में बदलाव
लंग एडेनोकार्सिनोमा, नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर का सबसे आम उपप्रकार है। यह उन लोगों में भी पाया जाता है, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। कुछ मामलों में EGFR और ALK जैसे जीन में होने वाले बदलाव कैंसर कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि में भूमिका निभा सकते हैं।
जीन, DNA के ऐसे हिस्से होते हैं जिनमें कोशिकाओं के बढ़ने, विभाजित होने और काम करने से जुड़ी जानकारी मौजूद रहती है। सामान्य परिस्थितियों में कोशिकाएं शरीर के संकेतों के अनुसार बढ़ती हैं और जरूरत पड़ने पर विभाजित होना बंद कर देती हैं। लेकिन DNA में कुछ बदलाव इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। नतीजतन, कोशिकाएं अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लगती हैं और समय के साथ कैंसर विकसित हो सकता है।
यह समझना भी जरूरी है कि कैंसर से जुड़े सभी आनुवंशिक बदलाव माता-पिता से विरासत में नहीं मिलते। कई बदलाव व्यक्ति के जीवनकाल में ही ट्यूमर की कोशिकाओं में विकसित होते हैं। इन्हें एक्वायर्ड या सोमेटिक म्यूटेशन कहा जाता है।
जीन की जांच से कैसे तय होता है इलाज?
फेफड़ों के कैंसर में मॉलिक्यूलर टेस्टिंग की अहम भूमिका हो सकती है। इस जांच में ट्यूमर के ऊतकों का विश्लेषण करके ऐसे आनुवंशिक बदलावों का पता लगाया जाता है, जिनके आधार पर विशेष दवाओं का विकल्प चुना जा सकता है।
टारगेटेड थेरेपी में ऐसी दवाएं इस्तेमाल की जाती हैं, जो कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि में मदद करने वाले खास संकेतों को रोकती हैं। इससे डॉक्टर मरीज के ट्यूमर की विशेषताओं के अनुसार इलाज की योजना बना सकते हैं।
हालांकि, हर लंग एडेनोकार्सिनोमा में EGFR या ALK म्यूटेशन नहीं मिलता और न ही हर मरीज को एक ही दवा से फायदा होता है। इलाज का चुनाव मॉलिक्यूलर टेस्ट के नतीजों, कैंसर के स्टेज और मरीज की संपूर्ण स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है।
सिगरेट नहीं पीते, तब भी इन वजहों से बढ़ सकता है खतरा
धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का एक प्रमुख जोखिम कारक है, लेकिन इसके अलावा भी कुछ परिस्थितियां बीमारी का खतरा बढ़ा सकती हैं। इनमें शामिल हैं:
- पैसिव स्मोकिंग: दूसरे व्यक्ति की सिगरेट या तंबाकू से निकलने वाले धुएं के संपर्क में रहना भी जोखिम बढ़ा सकता है।
- रेडॉन गैस: यह प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली रेडियोधर्मी गैस है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
- वायु प्रदूषण: प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने का संबंध फेफड़ों के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से है।
- हानिकारक पदार्थों का संपर्क: कुछ कार्यस्थलों पर कैंसर पैदा करने वाले पदार्थों के संपर्क में आने से भी खतरा बढ़ सकता है।
- कोशिकाओं में आनुवंशिक बदलाव: कुछ मामलों में ट्यूमर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव कैंसर के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।
इसलिए, धूम्रपान न करना फेफड़ों के कैंसर का खतरा कम करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे बीमारी होने की आशंका पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती।
फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षणों को न करें नजरअंदाज
लंग एडेनोकार्सिनोमा कई बार फेफड़ों के बाहरी हिस्सों में विकसित होता है। शुरुआती चरण में इसके स्पष्ट लक्षण नजर नहीं भी आ सकते हैं। कुछ मामलों में फेफड़ों में छोटी गांठ का पता किसी दूसरी बीमारी के लिए कराए गए CT स्कैन या अन्य इमेजिंग जांच के दौरान चलता है।
इमेजिंग जांच से डॉक्टर गांठ के आकार और उसकी प्रकृति का आकलन करते हैं। कैंसर की पुष्टि के लिए जरूरत पड़ने पर बायोप्सी या सर्जरी के दौरान निकाले गए ऊतक की जांच की जाती है।
फेफड़ों के कैंसर के संभावित लक्षणों में शामिल हैं:
- लगातार खांसी रहना या पुरानी खांसी के स्वरूप में बदलाव आना।
- सांस लेने में परेशानी होना।
- सीने में दर्द होना।
- खांसी के साथ खून आना।
- बिना किसी स्पष्ट वजह के वजन कम होना।
इन लक्षणों का मतलब हर बार कैंसर होना नहीं है। हालांकि, अगर ये लगातार बने रहें या बढ़ने लगें, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
फेफड़ों के कैंसर में सर्जरी का फैसला कैसे लेते हैं डॉक्टर?
कैंसर की पुष्टि होने के बाद डॉक्टर सबसे पहले यह पता लगाते हैं कि बीमारी किस स्टेज में है। इसके लिए ट्यूमर के आकार और स्थान, आसपास की लिम्फ नोड्स में कैंसर पहुंचने और शरीर के दूसरे अंगों तक बीमारी फैलने की स्थिति का आकलन किया जाता है।
इस प्रक्रिया में CT स्कैन, जरूरत पड़ने पर PET-CT, अन्य इमेजिंग जांच और लिम्फ नोड्स के नमूनों की जांच की जा सकती है। डॉक्टर मरीज की फेफड़ों की कार्यक्षमता, अन्य स्वास्थ्य समस्याओं और सर्जरी सहन करने की क्षमता का भी मूल्यांकन करते हैं।
सर्जरी का विकल्प मुख्य रूप से कैंसर के स्टेज, ट्यूमर की स्थिति और मरीज की सेहत पर निर्भर करता है। हर मरीज के लिए सर्जरी उपयुक्त नहीं होती।
सर्जरी से लेकर टारगेटेड थेरेपी तक, क्या हैं इलाज के विकल्प?
फेफड़ों के कैंसर का इलाज बीमारी के प्रकार, स्टेज और मरीज की स्थिति के आधार पर तय किया जाता है। इसमें सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी शामिल हो सकती हैं।
कुछ मरीजों को सर्जरी से पहले दवाओं के जरिए उपचार दिया जाता है, जबकि कुछ को सर्जरी के बाद अतिरिक्त इलाज की जरूरत पड़ सकती है। जिन मरीजों के ट्यूमर में दवाओं से प्रभावित होने वाला विशेष आनुवंशिक बदलाव मिलता है, उनके लिए टारगेटेड थेरेपी एक विकल्प हो सकती है।
पोप लियो XIV के मामले से जुड़ा बड़ा सवाल यही है कि धूम्रपान न करने के बावजूद फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे कई अलग-अलग कारक हो सकते हैं। इसलिए लगातार बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज न करना और जरूरत पड़ने पर समय पर चिकित्सकीय जांच कराना महत्वपूर्ण है।