बीजिंग: चीन में आर्थिक दबाव बढ़ने के बीच अब वहां के अमीर उद्योगपतियों और अरबपतियों की विदेशी संपत्तियां जांच के दायरे में आ गई हैं। स्थानीय सरकारों के घटते राजस्व और वित्तीय संकट से निपटने के लिए चीनी कर अधिकारियों ने ऑफशोर वेल्थ यानी विदेशों में रखी संपत्ति, विदेशी निवेश और उससे होने वाली आय की जांच तेज कर दी है। इस कार्रवाई ने चीन के धनकुबेरों के बीच बेचैनी बढ़ा दी है।
मामला सिर्फ विदेशी बैंक खातों तक सीमित नहीं है। चीनी टैक्स अधिकारियों की नजर विदेशी ट्रस्ट, विदेश में रखी संपत्ति और वहां से होने वाली आय पर भी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि चीन सरकार ने अचानक यह सख्ती क्यों बढ़ाई और इसका असर देश के अमीर तबके पर कितना पड़ सकता है?
क्या है पूरा मामला?
चीन में रियल एस्टेट संकट ने स्थानीय सरकारों की कमाई पर बड़ा असर डाला है। संपत्ति बाजार में कमजोरी के कारण स्थानीय राजस्व घटा है और वित्तीय दबाव बढ़ा है। इसी कमी को पूरा करने के लिए चीनी कर अधिकारियों ने विदेशी संपत्तियों और आय की निगरानी बढ़ा दी है।
इसके लिए ‘कॉमन रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड’ का सहारा लिया जा रहा है। इसके तहत चीनी करदाताओं की विदेशी बैंक संपत्तियों, ऑफशोर ट्रस्ट और विदेश से होने वाली आय की जानकारी पर नजर रखी जा रही है।
विदेश में संपत्ति रखने पर 20 फीसदी टैक्स का प्रावधान
चीन के टैक्स नियमों के मुताबिक, अगर कोई चीनी नागरिक अपनी पूंजी विदेशी ट्रस्ट या विदेश में मौजूद संपत्ति में ट्रांसफर करता है, तो उस पर 20 फीसदी टैक्स लागू होने का प्रावधान है। विदेश से होने वाली कमाई पर भी टैक्स की मांग की जा रही है।
यही वजह है कि विदेशी संपत्तियों वाले अमीर चीनियों के बीच चिंता बढ़ी है। उन्हें अब अपनी ऑफशोर संपत्ति और उससे होने वाली आय को लेकर टैक्स अधिकारियों की जांच का सामना करना पड़ रहा है।
90 दिन की मोहलत से क्यों बढ़ी बेचैनी?
चीनी अधिकारियों ने प्रभावित अरबपतियों और उद्योगपतियों को अपनी ऑफशोर संपत्तियों का खुलासा करने और बकाया टैक्स चुकाने के लिए 90 दिनों की समयसीमा दी है। इस समयसीमा ने उन लोगों की मुश्किल बढ़ा दी है, जिनकी बड़ी संपत्ति रियल एस्टेट या शेयरों में लगी हुई है।
समस्या यह है कि संपत्ति कागज पर करोड़ों या अरबों की हो सकती है, लेकिन उसे तुरंत नकदी में बदलना आसान नहीं होता। अचानक बड़े टैक्स बिल सामने आने के बाद कुछ बड़े निवेशकों को शेयर बेचने या कर्ज लेने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
हांगकांग से सिंगापुर तक क्यों मचा हड़कंप?
चीन के इस कदम का असर हांगकांग के वित्तीय बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। चीनी धनकुबेर लंबे समय से टैक्स और संपत्ति सुरक्षा के लिए हांगकांग में मौजूद ऑफशोर ट्रस्ट का इस्तेमाल करते रहे हैं।
अब टैक्स विभाग की सख्ती बढ़ने के बाद कुछ संपत्तियों को सिंगापुर जैसे दूसरे वित्तीय केंद्रों की ओर ले जाने की कोशिश तेज होने की बात सामने आ रही है। इससे चीन से बाहर निजी संपत्ति के प्रवाह और वैश्विक वित्तीय केंद्रों के बीच प्रतिस्पर्धा पर भी असर पड़ सकता है।
क्या सिर्फ टैक्स वसूली तक सीमित है कार्रवाई?
इस कार्रवाई को लेकर विशेषज्ञों की एक राय यह भी है कि मामला सिर्फ अतिरिक्त टैक्स जुटाने तक सीमित नहीं हो सकता। इसे चीन की ‘कॉमन प्रॉस्पेरिटी’ नीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है, जिसके तहत निजी क्षेत्र और निजी पूंजी पर सरकार की निगरानी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं।
चीन पहले भी बड़े निजी उद्योगपतियों और कंपनियों पर नियामकीय सख्ती बढ़ा चुका है। अब विदेशी संपत्तियों और आय की जांच तेज होने से निजी पूंजी पर सरकारी निगरानी का दायरा और बढ़ता दिखाई दे रहा है। हालांकि इस कार्रवाई का चीन के अमीरों, हांगकांग के वित्तीय बाजार और वैश्विक निवेश प्रवाह पर कितना असर पड़ेगा, यह आगे की घटनाओं से स्पष्ट होगा।