नई दिल्ली: महाभारत के प्रमुख पात्रों में शामिल दानवीर कर्ण अपनी उदारता और दानशीलता के लिए प्रसिद्ध हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, उनके दरवाजे से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था. कर्ण ने जीवनभर सोना, चांदी और कीमती वस्तुओं का दान किया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद स्वर्ग में एक ऐसी स्थिति आई, जिसने उन्हें हैरान कर दिया.
कथा के अनुसार, स्वर्ग पहुंचने पर कर्ण को उनके दान के बदले अपार धन-दौलत मिली, लेकिन जब उन्हें भूख लगी तो भोजन की जगह सोना, रत्न और गहने सामने रख दिए गए. आखिर ऐसा क्यों हुआ और इसका पितृपक्ष से क्या संबंध है? आइए जानते हैं इस पौराणिक कथा को.
स्वर्ग पहुंचकर भूखे क्यों रह गए कर्ण?
महाभारत के युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के बाद कर्ण की आत्मा के स्वर्ग पहुंचने की कथा मिलती है. वहां उन्हें जीवनभर किए गए दान के अनुरूप अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई.
लेकिन जब कर्ण को भूख लगी और उन्होंने भोजन मांगा, तो उनके सामने खाने के बजाय सोना, रत्न और आभूषण रख दिए गए. कई बार ऐसा होने पर कर्ण परेशान हो गए. उन्होंने देवराज इंद्र से इस समस्या का कारण जानना चाहा.
इंद्र ने बताया, क्यों नहीं मिला अन्न
पौराणिक कथा के अनुसार, कर्ण के सवाल पर देवराज इंद्र ने उन्हें बताया कि उन्होंने अपने जीवन में सोना, चांदी, धन और कीमती वस्तुओं का खूब दान किया था, लेकिन अपने पूर्वजों के नाम पर अन्न और जल का दान नहीं किया.
मान्यता के अनुसार, व्यक्ति जीवित रहते जिस वस्तु का दान करता है, मृत्यु के बाद उसे उसी के अनुरूप फल प्राप्त होता है. कर्ण ने अन्न और जल का दान नहीं किया था, इसलिए स्वर्ग में उन्हें भोजन नहीं मिल रहा था.
कर्ण को अपने असली वंश की जानकारी नहीं थी
इंद्र की बात सुनकर कर्ण ने अपनी मजबूरी बताई. कथा के अनुसार, उन्हें अपने वास्तविक जन्म, माता कुंती और अपने असली कुरु वंश के बारे में जीवन के अंतिम समय में पता चला था.
अपने कुल और पूर्वजों की जानकारी नहीं होने के कारण कर्ण अपने पितरों का श्राद्ध, तर्पण या उनके नाम पर अन्न दान नहीं कर सके थे. उन्होंने बताया कि इसमें उनकी कोई बदनीयती नहीं थी, बल्कि वे अपने वास्तविक कुल से ही अनजान थे.
16 दिन के लिए धरती पर लौटे कर्ण
कर्ण की बात सुनने के बाद उन्हें अपनी भूल सुधारने का अवसर दिया गया. पौराणिक कथा के अनुसार, कर्ण को 16 दिनों के लिए धरती पर वापस भेजा गया.
इन 16 दिनों में उन्होंने अपने पूर्वजों को याद किया और उनके नाम पर अन्न और जल का दान किया. उन्होंने गरीबों को भोजन कराया और तर्पण किया. इसके बाद जब कर्ण स्वर्ग लौटे तो उन्हें भोजन और तृप्ति प्राप्त हुई.
कर्ण की कथा से कैसे जुड़ा है पितृपक्ष?
इसी पौराणिक कथा को 16 दिनों की उस अवधि से जोड़ा जाता है, जिसे पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष कहा जाता है. इस दौरान लोग अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और अन्न-जल दान करते हैं.
धार्मिक मान्यता है कि पितृपक्ष में पूर्वजों के नाम पर किए गए दान और तर्पण से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है.
2026 में कब से शुरू होगा पितृपक्ष?
दिए गए पंचांग संबंधी विवरण के अनुसार, वर्ष 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से पूर्णिमा तिथि के श्राद्ध के साथ होगी. इसके बाद अलग-अलग तिथियों पर लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करेंगे.
पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में पूर्वजों के नाम पर अन्न और जल का दान करने का विशेष महत्व बताया गया है.