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गरबा में मुस्लिमों की एंट्री पर विवाद के बीच जानिए कितनी पुरानी है ये परंपरा? नवरात्रि से क्या है कनेक्शन और कैसे शुरू हुआ

vineet verma
Last updated: September 9, 2026 11:21 pm
vineet verma
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गांधीनगर: महाराष्ट्र में नवरात्रि से पहले गरबा कार्यक्रमों में मुस्लिमों की एंट्री पर रोक और आधार कार्ड की जांच को लेकर विवाद छिड़ गया है। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने गरबा आयोजनों के लिए गाइडलाइन जारी की है। इसमें प्रवेश से पहले आधार कार्ड की जांच और माथे पर तिलक लगाने के साथ हाथ में कलावा बांधने की बात कही गई है। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे ने इस मांग का समर्थन किया है।

Contents
गुजरात की लोक परंपरा से निकला गरबागांवों में देवी पूजा के साथ शुरू हुई परंपरानवरात्रि से क्यों जुड़ा है गरबा?गरबा और डांडिया एक नहीं हैंगुजरात से निकलकर विदेशों तक पहुंचा गरबामहाराष्ट्र में गरबा एंट्री को लेकर क्यों छिड़ा विवाद?

वहीं, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस ने कहा है कि अगर कोई शांतिपूर्वक उत्सव देखना चाहता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। शिवसेना उद्धव गुट के नेता संजय राऊत, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने गाइडलाइन पर आपत्ति जताई है। विपक्ष का आरोप है कि इस तरह की कोशिश समाज में नफरत फैलाने वाली है।

इस पूरे विवाद के बीच यह जानना भी जरूरी है कि आखिर गरबा कितना पुराना है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और नवरात्रि के साथ इसका रिश्ता क्या है।

गुजरात की लोक परंपरा से निकला गरबा

गरबा भारत के प्रमुख लोकनृत्यों में शामिल है और इसकी सबसे मजबूत पहचान गुजरात से जुड़ी है। नवरात्रि के दौरान लोग रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े पहनकर गोल घेरे में गरबा करते हैं। महिलाएं चनिया-चोली और पुरुष केडिया-पायजामा पहनते हैं।

गरबा को सिर्फ नृत्य या मनोरंजन नहीं माना जाता। यह मां शक्ति की उपासना, जीवन, ऊर्जा और सृजन शक्ति के सम्मान से जुड़ी परंपरा है।

गरबा शब्द को संस्कृत के ‘गर्भ’ शब्द से जुड़ा माना जाता है। पुराने समय में मिट्टी के घड़े में दीपक रखा जाता था। कई जगह इसे गर्भ-दीप या गरबो कहा जाता था। घड़े में बने छोटे-छोटे छेदों से दीपक की रोशनी बाहर आती थी। घड़ा शरीर का प्रतीक और उसके भीतर जलता दीपक आत्मा और शक्ति का प्रतीक माना जाता था। इसी दीपक के चारों ओर लोग गोल घेरा बनाकर नृत्य करते थे।

गांवों में देवी पूजा के साथ शुरू हुई परंपरा

इतिहासकारों और लोक परंपराओं के अनुसार, गरबा की शुरुआत गुजरात के गांवों में हुई। नवरात्रि के दौरान लोग एक जगह जुटकर देवी की पूजा करते थे और इसके बाद तालियों की लय पर सामूहिक नृत्य करते थे।

शुरुआती गरबा में ढोल, ढोलक, मंजीरा और तालियों का इस्तेमाल होता था। लोग देवी के भजन गाते हुए नृत्य करते थे। समय के साथ इसमें अलग-अलग कदम और ताल जुड़ते गए और गरबा का स्वरूप भी बदलता गया।

कुछ विद्वान गरबा जैसी नृत्य परंपराओं को प्राचीन लोकनृत्यों से जोड़ते हैं। हरिवंश पुराण में दंड रसक और ताल रसक जैसे नृत्यों का उल्लेख मिलता है। हालांकि, आज जिस रूप में गरबा को जाना जाता है, वह धीरे-धीरे गुजरात की लोक संस्कृति में विकसित हुआ। गरबा की परंपरा को सोलंकी और वाघेला काल से जोड़ने वाले मत भी मिलते हैं।

नवरात्रि से क्यों जुड़ा है गरबा?

नवरात्रि मां दुर्गा और शक्ति की उपासना का पर्व है। नौ रातों तक चलने वाले इस पर्व में देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।

गरबा के जरिए लोग देवी शक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। गरबा के बीच में कई जगह देवी की प्रतिमा या गर्भ-दीप रखा जाता है और लोग उसके चारों ओर घूमकर नृत्य करते हैं।

गोल घेरे को जीवन चक्र का प्रतीक भी माना जाता है। इसे जन्म, जीवन और मृत्यु के चक्र से जोड़कर देखा जाता है। गरबा में महिलाओं की भागीदारी भी खास रही है और इसे नारी शक्ति तथा सृजन क्षमता के सम्मान से जोड़ा जाता है।

गरबा और डांडिया एक नहीं हैं

अक्सर गरबा और डांडिया को एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन दोनों में अंतर है। गरबा में मुख्य रूप से तालियों, हाथों की मुद्राओं और गोल घेरे में नृत्य किया जाता है। इसके केंद्र में दीपक या देवी की प्रतिमा हो सकती है।

वहीं, डांडिया में रंगीन लकड़ी की छड़ियों का इस्तेमाल होता है। नर्तक एक-दूसरे की छड़ियों से ताल मिलाते हुए नृत्य करते हैं। डांडिया की छड़ियों को देवी दुर्गा की तलवार का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, आज कई आयोजनों में गरबा और डांडिया साथ-साथ होते हैं।

गुजरात से निकलकर विदेशों तक पहुंचा गरबा

समय के साथ गरबा गुजरात की सीमाओं से बाहर निकल गया। आज महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में नवरात्रि के दौरान गरबा कार्यक्रम होते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी भारतीय समुदाय बड़े गरबा आयोजन करता है।

जहां पहले गरबा मुख्य रूप से धार्मिक आयोजन हुआ करता था, वहीं अब इसका सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरूप भी काफी बड़ा हो गया है। बड़े शहरों में टिकट वाले कार्यक्रम, गरबा प्रतियोगिताएं और बड़े मैदानों में आयोजन आम हो चुके हैं। इनमें युवा बड़ी संख्या में हिस्सा लेते हैं और पारंपरिक संगीत के साथ आधुनिक संगीत का भी इस्तेमाल किया जाता है।

महाराष्ट्र में गरबा एंट्री को लेकर क्यों छिड़ा विवाद?

महाराष्ट्र में इस बार विवाद गरबा पंडालों में मुस्लिमों की एंट्री पर रोक लगाने की मांग को लेकर है। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की ओर से जारी गाइडलाइन में आधार कार्ड की जांच की बात कही गई है। इसके अलावा माथे पर तिलक लगाने और हाथ में कलावा बांधने की बात भी कही गई है।

मंत्री नितेश राणे ने इस मांग का समर्थन किया है, जबकि अमृता फडणवीस ने शांतिपूर्वक उत्सव देखने आने वालों को लेकर अलग राय रखी है। विपक्षी दलों ने इसे लेकर आपत्ति जताई है और सामाजिक सौहार्द का मुद्दा उठाया है।

ऐसे में गरबा को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब धार्मिक आयोजन से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। गरबा की ऐतिहासिक परंपरा नवरात्रि, देवी शक्ति और सामूहिक उत्सव से जुड़ी रही है। वहीं, महाराष्ट्र में इस साल प्रवेश और पहचान को लेकर उठे सवालों ने इसके आयोजन और सामाजिक स्वरूप पर नई बहस छेड़ दी है।

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