नई दिल्ली: हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार को जीवन की महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रियाओं में माना जाता है। अंतिम संस्कार के बाद मृत व्यक्ति की अस्थियों को पवित्र नदी में विसर्जित करने की परंपरा है। इनमें गंगा नदी को विशेष महत्व दिया गया है। लेकिन आखिर अस्थि विसर्जन के लिए गंगा को ही इतना पवित्र क्यों माना जाता है और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है?
हिंदू दर्शन और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मानव शरीर पंच तत्वों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिलकर बना है। मृत्यु के बाद शरीर इन्हीं पंच तत्वों में विलीन हो जाता है। अंतिम संस्कार के दौरान शरीर अग्नि में समर्पित किया जाता है और बची हुई अस्थियों को निर्धारित विधि के अनुसार एकत्र कर पवित्र नदी में विसर्जित किया जाता है।
पंच तत्वों में विलीन होता है शरीर
हिंदू दर्शन और गरुड़ पुराण की मान्यताओं के अनुसार, मनुष्य का शरीर पंच तत्वों से बना है। मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के माध्यम से शरीर का प्रकृति के इन्हीं तत्वों में विलय माना जाता है।
परंपरा के अनुसार, अंतिम संस्कार के बाद करीब तीन दिन के भीतर अस्थियां चुन ली जाती हैं। इसके बाद निर्धारित धार्मिक विधि के अनुसार इन्हें 10 दिन के भीतर गंगा या किसी अन्य पवित्र नदी में विसर्जित किया जाता है।
गंगा में अस्थि विसर्जन को क्यों माना जाता है शुभ?
सनातन धर्म और पौराणिक मान्यताओं में गंगा को मोक्षदायिनी कहा गया है। पद्म पुराण के स्वर्ग खंड में भी गंगा में अस्थि विसर्जन के महत्व का उल्लेख मिलता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, गंगा में अस्थियां रहने तक मृत व्यक्ति को लंबे समय तक स्वर्ग लोक में सम्मान प्राप्त होता है। इसी विश्वास के कारण मृत्यु के बाद अस्थि विसर्जन की परंपरा में गंगा का विशेष स्थान है।
राजा भागीरथ से जुड़ी है गंगा के मोक्षदायिनी होने की मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा भागीरथ ने कठोर तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने का प्रयास किया था। उनकी तपस्या का उद्देश्य अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाना था। इसी कथा के कारण गंगा को मोक्षदायिनी के रूप में विशेष धार्मिक महत्व मिला।
मान्यता है कि गंगा में अस्थि विसर्जन करने से मृत व्यक्ति की आत्मा को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है और आगे चलकर ब्रह्मलोक तक पहुंचने का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, इस अवस्था में आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति और मृत्यु के बाद परम शांति प्राप्त होती है।
अस्थि विसर्जन से आत्मा की मुक्ति की मान्यता
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अंतिम संस्कार और उससे जुड़े अनुष्ठानों के पूरा होने तक आत्मा का सांसारिक संबंध बना रहता है। गंगा में अस्थि विसर्जन को आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने और उसकी परलोक यात्रा में सहायता करने वाला अनुष्ठान माना जाता है।
यह भी मान्यता है कि यदि अंतिम संस्कार से जुड़े अनुष्ठान पूरे न हों या अस्थियों का विसर्जन न किया जाए, तो आत्मा को शांति नहीं मिलती। गंगा में अस्थि विसर्जन के बाद आत्मा के आध्यात्मिक रूप से शुद्ध होने और शांति की ओर बढ़ने की धार्मिक धारणा है।
हरिद्वार, वाराणसी और प्रयागराज का विशेष महत्व
गंगा में अस्थि विसर्जन के लिए हरिद्वार, वाराणसी और प्रयागराज को प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। इनमें हरिद्वार का विशेष महत्व माना जाता है।
हालांकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अस्थियों का विसर्जन किसी भी पवित्र नदी में किया जा सकता है, लेकिन गंगा को उसके दिव्य उद्गम, धार्मिक आस्था और हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित महत्व के कारण सबसे पवित्र माना जाता है। यही वजह है कि गंगा में अस्थि विसर्जन को मृत आत्मा की शांति और मोक्ष से जोड़कर देखा जाता है।