लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी कुछ महीने दूर हैं, लेकिन सियासी सरगर्मी तेज हो चुकी है. सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों ने अभी से अपने-अपने चुनावी एजेंडे पर काम शुरू कर दिया है। इस बार भी महिला वोटर पार्टियों की रणनीति के केंद्र में दिखाई दे रही हैं।
पिछले कुछ वर्षों में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में महिला मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। यही वजह है कि बीजेपी की योगी सरकार हो या मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी, दोनों ही महिलाओं को लेकर बड़े ऐलान कर रहे हैं। लेकिन यहां एक दिलचस्प सवाल खड़ा होता है—जिस आधी आबादी के वोट के लिए राजनीतिक दल योजनाओं की झड़ी लगा रहे हैं, उसे चुनाव लड़ने के लिए टिकट देने में वही दल पीछे क्यों रह जाते हैं?
सपा का बड़ा दांव, हर साल 40 हजार रुपये देने का वादा
महिला समानता दिवस के मौके पर समाजवादी पार्टी ने बुधवार को बड़ा चुनावी वादा किया. पार्टी ने कहा कि अगर 2027 में उसकी सरकार बनती है तो ‘स्त्री सम्मान समृद्धि योजना’ लागू की जाएगी।
इसके तहत महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए हर साल 40 हजार रुपये दिए जाने का वादा किया गया है. सपा ने यह भी कहा कि इस रकम को हर साल बढ़ाया जाएगा।
यानी सपा ने सीधे महिलाओं की आर्थिक स्थिति को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की है।
योगी सरकार भी महिलाओं पर फोकस कर रही
दूसरी ओर बीजेपी सरकार भी महिलाओं और बेटियों से जुड़े ऐलानों के जरिए अपना पक्ष मजबूत करने में जुटी है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति यात्रा योजना की शुरुआत की. इस दौरान उन्होंने ऐलान किया कि स्नातक की पढ़ाई कर रही 50 हजार छात्राओं को अक्टूबर-नवंबर में स्कूटी दी जाएगी।
रक्षाबंधन के मौके पर महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की सुविधा का भी ऐलान किया गया है. 27, 28 और 29 अगस्त को महिलाएं अपने एक सहयात्री के साथ मुफ्त बस यात्रा कर सकेंगी।
इसके अलावा योजना के तहत 60 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को निशुल्क बस यात्रा की सुविधा देने की बात भी कही गई है।
सीएम योगी ने कहा कि प्रदेश की डबल इंजन सरकार की योजनाओं के केंद्र में बेटियां हैं।
चुनावी राजनीति में महिला वोट इतना अहम क्यों?
दरअसल, पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाताओं की भूमिका राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही है. बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम तक चुनावी अभियानों में महिलाओं से जुड़े मुद्दे और योजनाएं प्रमुखता से दिखाई दिए।
महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा, नकद सहायता, गैस सिलेंडर, आवास, शिक्षा और रोजगार जैसी योजनाओं को राजनीतिक दल अपने चुनावी अभियान का हिस्सा बनाते रहे हैं.
लेकिन सवाल यह है कि महिलाओं के कल्याण और राजनीतिक भागीदारी में क्या अंतर है?
33 फीसदी आरक्षण की बात, लेकिन टिकट में कितनी हिस्सेदारी?
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए संसद में महिला आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है. लेकिन चुनावी आंकड़े बताते हैं कि प्रमुख राजनीतिक दल अभी भी महिलाओं को टिकट देने के मामले में अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचे हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में 543 सीटों पर कुल 8,360 उम्मीदवार मैदान में थे. इनमें महिला उम्मीदवारों की संख्या करीब 800, यानी लगभग 10 फीसदी रही।
इनमें 279 महिलाएं निर्दलीय और 267 गैर-मान्यता प्राप्त दलों से चुनाव मैदान में उतरी थीं. मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों से टिकट पाने वाली महिला उम्मीदवारों की संख्या इससे काफी कम रही.
UP में भी महिला उम्मीदवारों की तस्वीर बहुत अलग नहीं
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में कुल 4,442 उम्मीदवारों ने 403 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इनमें 559 महिलाएं थीं. यानी कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी रही.
हालांकि, 2017 के मुकाबले इसमें कुछ बढ़ोतरी जरूर हुई थी.
कांग्रेस ने ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान के तहत सबसे ज्यादा 155 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया. बीजेपी ने 45, समाजवादी पार्टी ने 42 और बहुजन समाज पार्टी ने 38 महिलाओं को मैदान में उतारा.
लेकिन नतीजों में तस्वीर बदल गई.
559 में सिर्फ 44 महिलाएं जीत पाईं
2022 के चुनाव में मैदान में उतरीं 559 महिला उम्मीदवारों में से शुरुआत में 44 महिलाएं विधायक बनीं. बाद के उपचुनावों के बाद यह संख्या 47 तक पहुंची।
बीजेपी की 29 महिला उम्मीदवारों ने जीत हासिल की. समाजवादी पार्टी की 14 और कांग्रेस की सिर्फ एक महिला उम्मीदवार चुनाव जीत सकीं।अपना दल (सोनेलाल) की तीन महिला उम्मीदवार भी विधानसभा पहुंचीं।
यानी जिस चुनाव में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया, वहां उसका प्रदर्शन सीटों के मामले में बेहद कमजोर रहा।
2017 में क्या था हाल?
2017 के विधानसभा चुनाव में कुल 485 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं।
बीजेपी ने 44 महिलाओं को टिकट दिया था. समाजवादी पार्टी ने 22, बसपा ने 20 और कांग्रेस ने 11 महिलाओं को मैदान में उतारा।
इनमें से 41 महिलाएं विधायक बनीं. बीजेपी और उसके सहयोगी अपना दल की 36 महिला उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी. बसपा और कांग्रेस की दो-दो और सपा की एक महिला उम्मीदवार चुनाव जीती थी. बाद के उपचुनावों से महिला विधायकों की संख्या में और इजाफा हुआ।
2012 में महिलाओं की भागीदारी और कम थी
2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में कुल 6,839 उम्मीदवारों में सिर्फ 583 महिलाएं थीं. यानी महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी महज 8.5 फीसदी थी।
उस चुनाव में बीजेपी ने 44, सपा ने 33, राष्ट्रीय लोक दल ने 25, बसपा ने 19 और कांग्रेस ने 11 महिलाओं को टिकट दिया था।
कुल 583 महिला उम्मीदवारों में से सिर्फ 35 महिलाएं विधायक बन सकीं.
अब 2027 में क्या होगा?
यही आंकड़े 2027 के चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल खड़ा करते हैं.
एक तरफ राजनीतिक दल महिलाओं के लिए नकद सहायता, मुफ्त यात्रा, स्कूटी और दूसरी सुविधाओं की घोषणा कर रहे हैं. दूसरी तरफ जब विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार उतारने की बारी आती है तो महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी सीमित रहती है।
ऐसे में असली परीक्षा सिर्फ महिला वोटरों को लुभाने की नहीं, बल्कि महिलाओं को सत्ता और चुनावी राजनीति में वास्तविक हिस्सेदारी देने की भी होगी।
2027 के यूपी चुनाव में अब देखना होगा कि बीजेपी, सपा, कांग्रेस और दूसरे दल महिलाओं के लिए कितने बड़े वादे करते हैं—और टिकट बंटवारे में उस वादे को कितनी ईमानदारी से जमीन पर उतारते हैं।