नई दिल्ली: यूपीएससी की तैयारी करने वालों के लिए किताबें सिर्फ कागज का ढेर नहीं होतीं। हर किताब के साथ घंटों की पढ़ाई, हजारों पन्नों पर लिखे नोट्स, मॉक टेस्ट और एक बेहतर भविष्य की उम्मीद जुड़ी होती है। ऐसे ही एक 26 वर्षीय अभ्यर्थी ने चार साल तक सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी करने के बाद अपनी किताबें और पुराने नोट्स कबाड़ी को बेच दिए। बदले में उसे सिर्फ 464 रुपये मिले। लेकिन उसके लिए यह रकम उन किताबों की कीमत नहीं थी, बल्कि चार साल लंबे एक ऐसे सफर का आखिरी पड़ाव थी, जिसमें उसने नौकरी छोड़ी, रिश्ता खोया और चार बार परीक्षा में किस्मत आजमाई।
चार कोशिशों के बाद छोड़ दी यूपीएससी की तैयारी
इस अभ्यर्थी ने यूपीएससी सिविल सर्विस परीक्षा के लिए चार बार प्रयास किया। 2023, 2024 और 2025 में वह लगातार तीन बार मुख्य परीक्षा तक पहुंचा। लेकिन आखिरी प्रयास में वह प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर सका।
लगातार कोशिशों, बार-बार नए सिरे से तैयारी करने और लंबे समय तक एक ही लक्ष्य के पीछे जुटे रहने के बाद उसने आखिरकार सिविल सर्विस की तैयारी छोड़ने का फैसला किया। उसके लिए यह फैसला इसलिए भी मुश्किल था, क्योंकि उसके जीवन के कई महत्वपूर्ण साल इसी लक्ष्य को हासिल करने में बीते थे।
सुबह 4 बजे की पढ़ाई से लेकर मेन्स के मॉक टेस्ट तक
अभ्यर्थी ने अपनी कहानी साझा करते हुए बताया कि उन किताबों के ढेर में सिर्फ कागज नहीं था। उसमें सुबह जल्दी उठकर पढ़ने की आदत, प्रीलिम्स के टेस्ट, मेन्स के मॉक पेपर, हाथ से बनाए गए नोट्स और बार-बार की गई गलतियों को सुधारने की कोशिशें शामिल थीं।
उसने कई जवाब लिखे, उनकी जांच की, गलतियां सुधारीं और फिर उन्हें दोबारा लिखा। हर बार कोशिश यही रही कि अगली परीक्षा में कुछ बेहतर किया जा सके। उसके लिए हर किताब उसकी चार साल की यात्रा का एक हिस्सा बन चुकी थी।
जब कबाड़ी के तराजू पर चढ़ीं चार साल की यादें
सबसे भावुक पल तब आया, जब उसने अपनी किताबों का आखिरी ढेर कबाड़ी के तराजू पर रखा। एक-एक करके एनसीईआरटी की किताबें, लक्ष्मीकांत, पुराने टेस्ट पेपर, नोट्स और वर्षों से जमा किया गया अध्ययन सामग्री का सामान उस तराजू पर जाता रहा।
उसके मुताबिक, उस समय उसे भीतर से खालीपन महसूस हो रहा था। जिस ढेर में उसके लिए चार साल की मेहनत, उम्मीद, निराशा और दोबारा खड़े होने की कोशिशें थीं, वह कबाड़ी के तराजू पर सिर्फ कुछ किलो सामान बनकर रह गया।
2022 में छोड़ दी थी अच्छी नौकरी
यूपीएससी की तैयारी के लिए इस अभ्यर्थी ने साल 2022 में अच्छी सैलरी वाली नौकरी छोड़ दी थी। उसे भरोसा था कि सिविल सर्विस के जरिए वह अपने करियर को एक नई दिशा दे सकेगा।
इस दौरान उसकी निजी जिंदगी भी कई बदलावों से गुजरी। उसका चार साल पुराना रिश्ता भी खत्म हो गया। इसके बावजूद उसने हर बार खुद को एक और प्रयास के लिए तैयार किया। उम्मीद और लक्ष्य हासिल करने की जिद उसे बार-बार किताबों के सामने ले आती रही।
चार साल की मेहनत के बदले मिले सिर्फ 464 रुपये
जब सारी किताबें बिक गईं तो उसे कुल 464 रुपये मिले। वहां मौजूद किसी व्यक्ति ने उसे सुझाव दिया कि वह कबाड़ी से 100 या 200 रुपये और मांग सकता था। लेकिन उस वक्त उसके लिए ज्यादा पैसे मिलना मायने नहीं रखता था।
उसका कहना था कि जिन किताबों से वह वह हासिल नहीं कर पाया, जिसकी उसे उम्मीद थी, उनके बदले 100-200 रुपये ज्यादा मिलने से अब क्या बदल जाएगा। उसके लिए असली कीमत उन किताबों की नहीं, बल्कि उन चार सालों की थी, जो अब वापस नहीं आने वाले थे।
मिले 464 रुपये भी मंदिर में कर दिए दान
किताबें बेचने के बाद मिले 464 रुपये उसने अपने पास नहीं रखे। उसने पूरी रकम मंदिर में दान कर दी। उसके मुताबिक, यह दान किसी पुण्य, किस्मत या अगली कोशिश की उम्मीद में नहीं था।
उसने इसे अपने लंबे सफर का आखिरी पड़ाव बताया। उसकी बातों में थकान के साथ-साथ जिंदगी को नए सिरे से शुरू करने का फैसला भी दिखाई दिया। उसने साफ कर दिया कि अब वह दोबारा यूपीएससी की तैयारी नहीं करेगा।
पोस्ट पढ़कर भावुक हुए लोग
अभ्यर्थी की पोस्ट सामने आने के बाद कई यूपीएससी अभ्यर्थियों और पूर्व उम्मीदवारों ने उससे अपनी कहानी जुड़ी हुई महसूस की। कई लोगों ने कहा कि इस दर्द को वही समझ सकता है, जिसने खुद सिविल सर्विस की तैयारी के दौर को जिया हो।
एक यूजर ने अपनी यात्रा को भी इससे मिलती-जुलती बताया और कहा कि यूपीएससी की तैयारी के भीतर से गुजरने वाला व्यक्ति ही इस दर्द को पूरी तरह समझ सकता है। वहीं दूसरे यूजर ने उसे आगे की जिंदगी के लिए हिम्मत और ताकत की शुभकामनाएं दीं।
जब यूपीएससी एक परीक्षा से बढ़कर पूरी जिंदगी बन जाती है
इस कहानी ने एक बार फिर उस दबाव की ओर ध्यान खींचा है, जिसका सामना सिविल सर्विस की तैयारी करने वाले हजारों युवा करते हैं। कई अभ्यर्थी वर्षों तक एक ही लक्ष्य के पीछे लगे रहते हैं और इसी दौरान नौकरी, रिश्ते, परिवार, पैसे और निजी जिंदगी से जुड़े कई बड़े फैसले भी उसी लक्ष्य के हिसाब से लेते हैं।
लेकिन हर मेहनत का नतीजा चयन के रूप में सामने आए, यह जरूरी नहीं है। कई बार सबसे मुश्किल फैसला यह होता है कि कब रुक जाना चाहिए। इस अभ्यर्थी के लिए किताबों को बेच देना शायद सिर्फ एक परीक्षा की तैयारी खत्म करना नहीं था, बल्कि जिंदगी के उस लंबे दौर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का फैसला था।