नई दिल्ली: भारत आज अपना तीसरा राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मना रहा है। जिस देश ने कभी रॉकेट के हिस्सों को साइकिल से लॉन्च पैड तक पहुंचाया था, वही भारत आज चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग कर चुका है और मंगल की कक्षा तक अपनी पहुंच बना चुका है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की यह यात्रा संघर्ष, सीमित संसाधनों और असाधारण वैज्ञानिक उपलब्धियों से भरी रही है।
23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद इस तारीख को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया गया। इस मौके पर नजर डालते हैं भारतीय स्पेस प्रोग्राम की उन 10 खास उपलब्धियों पर, जिन्होंने दुनिया में भारत की अलग पहचान बनाई।
कम बजट में चांद-मंगल तक पहुंचा भारत
भारतीय अंतरिक्ष मिशनों की सबसे खास बात उनकी लागत भी रही है। भारत ने सीमित बजट में ऐसे मिशन पूरे किए, जिन पर दुनिया का ध्यान गया।
- चंद्रयान-1: करीब 386 करोड़ रुपये
- मंगलयान: करीब 450 करोड़ रुपये
- हॉलीवुड फिल्म ‘ग्रैविटी’: करीब 700 करोड़ रुपये
यानी भारत ने कई बड़े अंतरिक्ष अभियानों को बेहद कम लागत में अंजाम देकर दुनिया को अपनी तकनीकी क्षमता दिखाई।
साइकिल और बैलगाड़ी से शुरू हुई थी कहानी
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के शुरुआती दौर की तस्वीरें आज भी लोगों को हैरान करती हैं। 1963 में भारत के पहले रॉकेट लॉन्च की तैयारी के दौरान उसके हिस्सों को साइकिल से लॉन्च पैड तक ले जाया गया था।
बाद में 1981 में एक सैटेलाइट को बैलगाड़ी से ले जाने की तस्वीर भी सामने आई। इसके पीछे वजह संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जरूरत थी। लकड़ी की बैलगाड़ी में धातु नहीं होने के कारण सैटेलाइट के एंटीना की टेस्टिंग के दौरान मैग्नेटिक इंटरफेरेंस से बचने में मदद मिली।
पहली कोशिश में मंगल की कक्षा में पहुंचा भारत
भारत ने 5 नवंबर 2013 को मंगलयान-1 लॉन्च किया था। इस मिशन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि भारत अपनी पहली कोशिश में ही मंगल की कक्षा तक पहुंचने वाला पहला देश बना।
अमेरिका और रूस जैसी अंतरिक्ष महाशक्तियों को भी मंगल तक पहुंचने में कई प्रयास लगे थे। भारत ने करीब 400 करोड़ रुपये के बजट में यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की और दुनिया को अपनी अंतरिक्ष क्षमता का लोहा मनवाया।
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास रचा इतिहास
चंद्रयान-3 की सफल सॉफ्ट लैंडिंग ने भारत को अंतरिक्ष इतिहास में एक खास स्थान दिलाया। भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के पास सफलतापूर्वक उतरने वाला पहला देश बना।
जिस स्थान पर लैंडर ने लैंडिंग की, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘शिव शक्ति पॉइंट’ नाम दिया।
चांद पर पानी की मौजूदगी के मिले पुख्ता संकेत
भारत के चंद्रयान-1 ने वर्ष 2008 में चंद्रमा की सतह पर पानी और हाइड्रॉक्सिल की मौजूदगी के महत्वपूर्ण संकेत खोजे थे। इसके लिए मिशन में लगे मून मिनरलॉजी मैपर उपकरण ने अहम भूमिका निभाई।
इस खोज ने चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी को लेकर दुनिया की वैज्ञानिक समझ को नई दिशा दी।
भारत ने बनाया अपना नेविगेशन सिस्टम
कारगिल युद्ध के दौरान भारत को अमेरिकी GPS डेटा का लाभ नहीं मिला था। इसके बाद भारत ने अपनी स्वदेशी नेविगेशन क्षमता विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
आज भारत के पास NavIC है, जो नेविगेशन और टाइमिंग सेवाओं में देश की विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद करता है।
चांद के बाद सूरज पर नजर
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम सिर्फ चंद्रमा और मंगल तक सीमित नहीं रहा। ISRO ने सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य-L1 मिशन लॉन्च किया।
यह भारत का पहला सोलर मिशन है और इसे सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के L1 लैग्रेंज पॉइंट के आसपास तैनात किया गया है, जहां से सूर्य की गतिविधियों का लगातार अध्ययन किया जा सकता है।
एक साल के लिए बना ऑर्बिटर करीब 7 साल चला
चंद्रयान-2 की लैंडिंग भले ही पूरी तरह सफल नहीं हो पाई, लेकिन मिशन का ऑर्बिटर बेहद सफल रहा। इसे करीब एक साल के लिए डिजाइन किया गया था, लेकिन बेहतर मिशन मैनेजमेंट और तकनीकी प्रदर्शन के कारण यह करीब सात साल तक सक्रिय रहा।
यह उपलब्धि भी भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की क्षमता और मिशन संचालन की मजबूती को दिखाती है।
गगनयान से इंसानों को अंतरिक्ष भेजने की तैयारी
भारत अब मानव अंतरिक्ष उड़ान की दिशा में भी आगे बढ़ चुका है। गगनयान मिशन के जरिए भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को स्वदेशी रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी की जा रही है।
मानव मिशन से पहले ‘व्योममित्र’ नाम की ह्यूमनॉइड को अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। इसे इंसानों जैसी गतिविधियों और अंतरिक्ष यान के सिस्टम से जुड़ी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए विकसित किया गया है।
23 अगस्त ने बदल दी भारत की अंतरिक्ष पहचान
23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई दी। इसी उपलब्धि की याद में 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस घोषित किया गया।
साइकिल और बैलगाड़ी से रॉकेट के हिस्से पहुंचाने से लेकर चांद के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र तक पहुंचने और मंगल की कक्षा में पहली कोशिश में प्रवेश करने तक, भारत का अंतरिक्ष सफर बताता है कि सीमित संसाधन वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा के रास्ते में बाधा नहीं बनते।