Highlights
- संसद से पास हुआ बिल: ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ संसद के दोनों सदनों से पारित।
- ओवैसी का तीखा हमला: AIMIM प्रमुख बोले- “वंदे मातरम को अनिवार्य बनाना संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 का उल्लंघन।”
- संवैधानिक बहस: राष्ट्रगान (जन गण मन) और राष्ट्रगीत (वंदे मातरम) के अंतर पर फिर छिड़ी देशव्यापी राजनीतिक बहस।
नई दिल्ली। संसद से ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित होने के बाद देश में नया राजनीतिक और संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस कानून का पुरजोर विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकारों पर हमला करार दिया है।
संसद भवन परिसर में मीडिया से बात करते हुए ओवैसी ने स्पष्ट किया कि एक मुस्लिम होने के नाते वह केवल अल्लाह की इबादत कर सकते हैं और किसी भी अन्य स्वरूप की आराधना उनके मजहबी उसूलों के खिलाफ है।
‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ में अंतर: ओवैसी का तर्क
असदुद्दीन ओवैसी ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के बीच के अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि दोनों का स्वरूप और भाव पूरी तरह अलग है:
- जन गण मन (राष्ट्रगान): इसमें पूरे देश, उसकी विविधता और यहां के लोगों के प्रति सम्मान झलकता है।
- वंदे मातरम (राष्ट्रगीत): इसमें देवी-देवताओं की वंदना और आराधना का भाव शामिल है, जिसे हर नागरिक पर थोपा नहीं जा सकता।
“मैं एक सच्चा मुस्लिम हूँ और अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं कर सकता। अगर मैं किसी और की इबादत करता हूँ, तो यह मेरे धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने की कोई भी कोशिश संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन है।”–असदुद्दीन ओवैसी, प्रमुख, AIMIM
1950 के फैसले और ‘राष्ट्रीय गीत’ के दर्जे पर सवाल
ओवैसी ने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए दावा किया कि 1950 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिए जाने के फैसले में संवैधानिक खामियां थीं। उन्होंने तर्क दिया कि इसके लिए संसद में कोई औपचारिक प्रस्ताव पास नहीं किया गया था और भारतीय संविधान में ‘राष्ट्रीय गीत’ की कोई स्पष्ट परिभाषा दर्ज नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इस विधेयक के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता), अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों का प्रबंधन) और अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यक अधिकार) का सीधा उल्लंघन कर रही है।
विधेयक पर आमने-सामने सरकार और विपक्ष
विधेयक के पारित होने के बाद राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। जहाँ सत्तारूढ़ दल और सरकार इसे राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान बढ़ाने और राष्ट्रभक्ति की भावना को मजबूत करने वाला ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और अल्पसंख्यक नेता इसे नागरिक अधिकारों में हस्तक्षेप बताकर विरोध दर्ज करा रहे हैं।