नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री के पद छोड़ने की घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पिछले 12 वर्षों में उन चुनिंदा मौकों में शामिल किया जा रहा है, जब व्यापक जनदबाव के बीच केंद्र सरकार को अपना रुख बदलना पड़ा। इससे पहले नागरिकता से जुड़े विवाद, कृषि कानूनों के विरोध और एक मंत्री के इस्तीफे जैसे मामलों में भी सरकार ने परिस्थितियों के अनुसार अहम फैसले लिए थे।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा बना नई राजनीतिक चर्चा का केंद्र
नीट परीक्षा से जुड़े विवाद और लंबे समय तक चले छात्र आंदोलनों के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया। इसे पिछले एक दशक में जनदबाव के बाद सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख राजनीतिक कदमों में गिना जा रहा है। इससे पहले भी कुछ ऐसे अवसर आए, जब विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार को अपने रुख में बदलाव करना पड़ा।
एनआरसी पर बदला गया सार्वजनिक रुख
नागरिकता संशोधन कानून और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को लेकर देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इसी दौरान सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि देशव्यापी एनआरसी को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे सरकार के सार्वजनिक रुख में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा।
कृषि कानून वापस लेने का फैसला
तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन करीब एक वर्ष तक चला। शुरुआत में सरकार अपने फैसले पर कायम रही, लेकिन लंबे आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री ने तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की और किसानों से माफी भी मांगी। यह फैसला सरकार के सबसे बड़े नीति परिवर्तन के रूप में देखा गया।
पेपर लीक विवाद ने बढ़ाया दबाव
नीट पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली को लेकर देशभर में छात्रों का विरोध लगातार बढ़ता गया। आंदोलन के दौरान शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा की निष्पक्षता और जवाबदेही जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए गए। विरोध तेज होने के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे इस पूरे घटनाक्रम ने नया राजनीतिक मोड़ ले लिया।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत क्या रही?
इस बार का विरोध प्रदर्शन अपने स्वरूप के कारण भी अलग माना गया। आंदोलन किसी एक संगठन या पारंपरिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा। बड़ी संख्या में छात्र और युवा विभिन्न माध्यमों से एकजुट हुए और विरोध लगातार फैलता गया। सोशल मीडिया, डिजिटल मंचों और जनसहभागिता ने इस अभियान को व्यापक पहचान दिलाई।
राजनीतिक समीकरण भी बदले
राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि इस आंदोलन ने पारंपरिक विपक्षी राजनीति से अलग एक नया स्वरूप दिखाया। विरोध प्रदर्शन के दौरान विभिन्न वर्गों के छात्रों और युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ती गई, जिससे राजनीतिक हलकों में इसकी अलग तरह से चर्चा होने लगी।
मीटू आंदोलन के दौरान भी हुआ था मंत्री का इस्तीफा
मोदी सरकार के कार्यकाल में इससे पहले केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर ने भी अपने पद से इस्तीफा दिया था। वह मामला अलग परिस्थितियों से जुड़ा था, लेकिन नागरिक समाज के दबाव के बाद मंत्री पद छोड़ने का वह भी एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है।
सरकार का क्या है पक्ष?
सरकार की ओर से लगातार यह कहा गया है कि छात्रों से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। साथ ही परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने के लिए सुधारात्मक उपायों पर भी काम जारी है।