नई दिल्ली। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते को लेकर अब बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। समझौते के दौरान तीन देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा और एक-दूसरे की मदद की बात कही गई थी, लेकिन सऊदी अरब पर हूती हमलों के बाद पाकिस्तान ने सैन्य प्रतिक्रिया को लेकर दूरी बना ली है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान के बयान के बाद इस रक्षा समझौते की वास्तविक प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की मदद के लिए समझौते के तहत सैन्य जवाब देने पर फिलहाल कोई बातचीत नहीं चल रही है।
मक्का में हुआ था बड़ा रक्षा समझौता
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का में रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसे तीनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग मजबूत करने की दिशा में अहम कदम बताया गया था।
समझौते को लेकर यह संदेश गया था कि किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में बाकी सहयोगी देश उसकी सुरक्षा के लिए आगे आ सकते हैं। इसी वजह से इसे मुस्लिम देशों के बीच एक बड़े सुरक्षा गठजोड़ के तौर पर भी पेश किया गया।
हूती हमलों के बाद पाकिस्तान के रुख ने चौंकाया
सऊदी अरब के शहरों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हूती हमलों के बाद इस समझौते की असली परीक्षा की स्थिति बनी।
ऐसे समय में पाकिस्तान से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह सऊदी अरब के समर्थन में अपनी सैन्य भूमिका को लेकर स्पष्ट रुख अपनाएगा। लेकिन पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के बयान ने फिलहाल इन उम्मीदों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि मक्का समझौते के तहत सऊदी अरब के समर्थन में सैन्य कार्रवाई को लेकर फिलहाल कोई चर्चा नहीं हो रही है।
क्या समझौते में है कोई ‘लूपहोल’?
पाकिस्तान के इस रुख के बाद सबसे बड़ा सवाल समझौते की शर्तों को लेकर उठ रहा है। क्या यह समझौता हर सैन्य हमले की स्थिति में तत्काल सैन्य हस्तक्षेप के लिए बाध्य करता है या इसमें ऐसी परिस्थितियों के लिए अलग प्रावधान हैं?
यही बिंदु अब पाकिस्तान के रुख को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। यदि समझौते में सैन्य प्रतिक्रिया को लेकर स्पष्ट और अनिवार्य प्रावधान नहीं हैं, तो इस्लामाबाद अपने मौजूदा रुख को उसी आधार पर सही ठहरा सकता है।
‘मुस्लिम NATO’ के दावे की भी होगी परीक्षा
मक्का समझौते को लेकर शुरुआत में इसे मुस्लिम देशों के बीच बड़े सुरक्षा गठजोड़ के रूप में देखा गया था। ऐसे में सऊदी अरब पर हमलों के बाद पाकिस्तान का सैन्य प्रतिक्रिया से फिलहाल पीछे रहना इस गठजोड़ की क्षमता पर बहस को जन्म दे सकता है।
खासकर तब, जब समझौते की घोषणा के समय सामूहिक सुरक्षा सहयोग को इसकी सबसे बड़ी विशेषता के रूप में देखा गया था।
सऊदी-पाकिस्तान रिश्तों के लिए भी अहम मोड़
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से रणनीतिक और रक्षा संबंध रहे हैं। ऐसे में मक्का रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान का मौजूदा रुख दोनों देशों के रिश्तों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, सिर्फ एक बयान के आधार पर समझौते को पूरी तरह निष्प्रभावी मानना जल्दबाजी होगी। आगे यह देखना होगा कि सऊदी अरब पर हमले बढ़ने की स्थिति में पाकिस्तान अपनी सैन्य और कूटनीतिक भूमिका को लेकर क्या फैसला करता है।
अब सबसे बड़ा सवाल- समझौता कितना प्रभावी?
मक्का डिफेंस पैक्ट के बाद पहली बड़ी चुनौती ने ही उसके व्यावहारिक स्वरूप पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पाकिस्तान का फिलहाल सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाना यह संकेत देता है कि समझौते की राजनीतिक घोषणा और उसके वास्तविक सैन्य दायित्व के बीच अंतर हो सकता है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि सऊदी अरब इस रुख को किस तरह देखता है और आने वाले दिनों में पाकिस्तान से किसी सैन्य या रणनीतिक सहयोग की मांग करता है या नहीं