ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम विदाई को लेकर पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई हैं। ईरान के सरकारी मीडिया ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ब्रॉडकास्टिंग’ (IRIB) ने एक बेहद भावुक करने वाला खुलासा किया है। एक बिना तय कार्यक्रम के, अचानक अयातुल्ला खामेनेई के पार्थिव शरीर वाले ताबूत को ठीक उसी जगह ले जाया गया, जहां अमेरिकी-इजरायली हवाई हमले में उनकी मौत हुई थी। ईरान में इसे उनकी ‘शहादत’ की जगह मानकर अंतिम सम्मान दिया गया।
तेहरान में इतिहास की सबसे बड़ी भीड़ का अनुमान (2 करोड़ लोग जुटेंगे)
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के मुताबिक, 4 और 5 जुलाई को होने वाले इस सार्वजनिक विदाई समारोह में सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। अनुमान है कि अपने महबूब नेता को आखिरी विदाई देने के लिए तेहरान की सड़कों पर 2 करोड़ से ज्यादा लोग उमड़ सकते हैं, जो इतिहास की सबसे बड़ी भीड़ में से एक होगी।
भारत की तरफ से ‘लेफ्टिनेंट जनरल हसनैन’ और केंद्रीय मंत्री पहुंचे तेहरान
इस ऐतिहासिक और कूटनीतिक अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत सरकार ने भी अपने सबसे वीआईपी प्रतिनिधिमंडल को रवाना किया है। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) के मुताबिक:
सैयद अता हसनैन (बिहार के राज्यपाल): भारतीय सेना के पूर्व शीर्ष कमांडर (लेफ्टिनेंट जनरल रिटायर्ड) और मौजूदा बिहार के गवर्नर सैयद अता हसनैन आज ईरान पहुंच चुके हैं।
पवित्र मार्गेरिटा (विदेश राज्य मंत्री): भारत सरकार की तरफ से केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पवित्र मार्गेरिटा भी अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
UN चीफ एंटोनियो गुटेरेस ने फोन पर जताया शोक, कूटनीति तेज
खामेनेई के विदाई समारोह से ठीक पहले संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से फोन पर लंबी बातचीत की। इस दौरान UN चीफ ने ग्रैंड अयातुल्ला खामेनेई की मौत पर गहरा शोक व्यक्त किया।
फोन पर क्या बात हुई?
शोक संदेश के अलावा दोनों नेताओं के बीच मिडिल ईस्ट में जारी भीषण तनाव, होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा, लेबनान में संघर्ष-विराम (Ceasefire) और पर्दे के पीछे चल रही शांति वार्ताओं को लेकर गंभीर चर्चा हुई।
अफ्रीका को लेकर खामेनेई की वो सोच, जिसे आज दुनिया याद कर रही है
अयातुल्ला खामेनेई की मौत पर वैश्विक मंचों से श्रद्धांजलि का सिलसिला जारी है। घाना स्थित ईरानी दूतावास ने साल 2016 में घाना के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा और खामेनेई के बीच हुई उस ऐतिहासिक मुलाकात को याद किया, जो बताती है कि वह किस कदर दूरदर्शी थे।
दूतावास ने सोशल मीडिया पर बताया, “उन्होंने कभी तेल के सौदों या बिजनेस एग्रीमेंट पर बात नहीं की, बल्कि हमेशा अफ्रीका के मान-सम्मान पर बात की। खामेनेई का मानना था कि चरमपंथ अफ्रीका की अपनी समस्या नहीं है, बल्कि इसे पश्चिमी देशों और जायोनी (इजरायल) शासन द्वारा बढ़ावा दिया गया है।”
खामेनेई अफ्रीका को सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी महाद्वीप के रूप में देखते थे जो अपने पैरों पर खड़ा होने का हकदार है। ईरान भले ही इस हफ्ते अपने ‘शहीद इमाम’ को सुपुर्द-ए-खाक कर रहा है, लेकिन दुनिया के लिए कहे गए उनके यह कूटनीतिक शब्द हमेशा जिंदा रहेंगे।