ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में मौसम का मिजाज पूरी दुनिया को डरा रहा है। भारत में जहां लोग 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक की भीषण गर्मी को जैसे-तैसे बर्दाश्त कर लेते हैं, वहीं यूरोप में पारा 40 डिग्री सेल्सियस छूते ही हाहाकार मच गया है। अकेले फ्रांस में ही 1,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि जर्मनी, यूके और इटली जैसे देशों में हालात बेकाबू हैं।
यूरोप में जानलेवा किलर हीटवेव के बीच, इटली की राजधानी “रोम” से एक ऐसी हाई-टेक उम्मीद सामने आई है, जो अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए किसी लाइफसेवर से कम नहीं है। आखिर यूरोप में लो टेम्प्रेचर “कम तापमान” के बावजूद इतनी मौतें क्यों हो रही हैं? और बुजुर्गों की जान बचाने के लिए वहां की सरकारें किस स्मार्ट ‘ब्लैक ब्रेसलेट’ ‘स्मार्ट वॉच’ टेक्नोलॉजी का सहारा ले रही हैं?
आखिर 40°C पर ही क्यों घुटनों पर आ गया यूरोप?
क्लाइमेट क्लाइमेट और इंफ्रास्ट्रक्चर एक्सपर्ट्स के अनुसार, इसके पीछे दो मुख्य और बेहद गंभीर कारण हैं:
ओवन’ बन चुके हैं यूरोप के घर: यूरोप के देशों में साल के अधिकांश महीनों में कड़ाके की ठंड पड़ती है। इसी वजह से वहां के घर कंक्रीट की मोटी दीवारों और खास इंसुलेशन से बनाए जाते हैं ताकि अंदर की गर्मी बाहर न निकल सके। ठंड में वरदान साबित होने वाली यह तकनीक इस समय अभिशाप बन चुकी है। घर सूरज की गर्मी को अंदर लॉक कर रहे हैं, जिससे कमरे ओवन जैसे तप रहे हैं। डराने वाली बात यह है कि पूरे यूरोप में 5% घरों में भी एयर कंडीशनर नहीं हैं।

जानलेवा उमस: यूरोप की यह हीटवेव सूखी नहीं, बल्कि बेहद उमस भरी है। हवा में नमी का स्तर इतना ज्यादा है कि इंसानी शरीर का नेचुरल कूलिंग सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है। पसीना न सूखने के कारण शरीर का तापमान अंदर ही अंदर बढ़ने लगता है, जो साइलेंट हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का कारण बन रहा है।
कूलिंग प्रोडक्ट्स के लिए हाहाकार
यूरोप के इतिहास में ऐसी गर्मी कभी नहीं देखी गई। स्थिति यह है कि एयर कंडीशनर, कूलर और पंखे खरीदने के लिए इलेक्ट्रॉनिक शोरूम्स में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में लोग दुकानों से तेजी से कूलिंग प्रोडक्ट्स उठाते नजर आ रहे हैं।

संकट में मसीहा बना ‘ब्लैक ब्रेसलेट’
इस आपदा में सबसे बड़ा खतरा उन बुजुर्गों पर है जो घरों में अकेले रहते हैं और गर्मी के कारण तुरंत मदद नहीं मांग पाते। इस समस्या से निपटने के लिए रोम “इटली” प्रशासन ने 456 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 3,800 करोड़ रुपए से अधिक) के एक मेगा प्रोजेक्ट के तहत बुजुर्गों को एक खास ‘ब्लैक ब्रेसलेट’ देना शुरू किया है।

यह ‘ब्लैक ब्रेसलेट’ कैसे काम करता है?
यह काले प्लास्टिक का एक हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक ब्रेसलेट है, जो दिखने में साधारण डिजिटल घड़ी जैसा है, लेकिन इसके फीचर्स कमाल के हैं:
यह ब्रेसलेट बुजुर्गों के दिल की धड़कन और उनकी शारीरिक गतिविधियों को लगातार ट्रैक और 24/7 हेल्थ मॉनिटरिंग भी करता रहता है।
अगर किसी बुजुर्ग को अचानक घबराहट, सांस लेने में तकलीफ या बेचैनी महसूस होती है, तो वे ब्रेसलेट पर दिए गए बटन को दबा सकते हैं। बटन दबाते ही सीधे सोशल वर्कर्स और इमरजेंसी मेडिकल टीम को अलर्ट चला जाता है।

अगर कोई बुजुर्ग गर्मी या कमजोरी के कारण अचानक चक्कर खाकर फर्श पर गिर जाता है या बेहोश हो जाता है, तो इसमें लगे मोशन सेंसर्स इसे तुरंत भांप लेते हैं। यह ब्रेसलेट बिना बटन दबाए भी खुद-ब-खुद इमरजेंसी सर्विसेज को लोकेशन के साथ अलर्ट भेज देता है, जिससे समय रहते एम्बुलेंस उनके घर पहुंच जाती है। वर्तमान में रोम के 700 से अधिक बुजुर्ग इस डिजिटल सुरक्षा कवच का लाभ उठा रहे हैं।

यूरोप की यह हीटवेव और रोम का यह ‘ब्लैक ब्रेसलेट’ हमें सिखाता है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अब सिर्फ पारंपरिक तरीकों के भरोसे नहीं रहा जा सकता। आने वाले समय में इंसानी जान बचाने के लिए ऐसी ही स्मार्ट और एडवांस टेक्नोलॉजी को अपनाना वक्त की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।